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भारत को विश्वगुरु बनाने की राह में संस्कार, अनुशासन और सामूहिक शक्ति का संदेश

नई दिल्ली राष्ट्र निर्माण केवल नीतियों और योजनाओं से नहीं होता, बल्कि ऐसे नागरिकों से होता है जो अपने कर्तव्यों के प्रति सजग, समाज के प्रति संवेदनशील और राष्ट्र के प्रति समर्पित हों। इसी विचार को केंद्र में रखकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दिल्ली प्रान्त द्वारा आयोजित 15 दिवसीय संघ शिक्षा वर्ग – स्कूल विद्यार्थी का बुधवार को भव्य समापन हुआ। वसंत कुंज स्थित पूर्ण प्रज्ञा पब्लिक स्कूल में आयोजित इस समारोह ने न केवल प्रशिक्षण प्राप्त विद्यार्थियों की प्रतिभा और अनुशासन को प्रदर्शित किया, बल्कि राष्ट्र निर्माण के व्यापक दृष्टिकोण को भी सामने रखा।

व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र पुनर्निर्माण का संदेश
समापन समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित उत्तर क्षेत्र प्रचारक जतिन कुमार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के विचारों को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत के पुनरुत्थान का सबसे प्रभावी माध्यम व्यक्ति निर्माण है। उन्होंने बताया कि डॉ. हेडगेवार ने अपने सामाजिक अनुभवों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला था कि यदि समाज में चरित्रवान, कर्तव्यनिष्ठ और राष्ट्रभक्त व्यक्तियों का निर्माण हो जाए, तो देश की हर चुनौती का समाधान संभव है।

उन्होंने कहा कि इसी उद्देश्य से संघ ने दैनिक शाखा की अभिनव व्यवस्था विकसित की, जिसके माध्यम से स्वयंसेवकों को शारीरिक, बौद्धिक और मानसिक रूप से तैयार किया जाता है। उनका मानना था कि राष्ट्र सेवा के लिए केवल भावनाएं ही नहीं, बल्कि क्षमता, अनुशासन और संगठन भी आवश्यक हैं।

विश्वगुरु भारत के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी
अपने संबोधन में जतिन कुमार ने कहा कि समाज की सज्जन शक्ति के सहयोग से राष्ट्रहित में समर्पित नागरिकों के निर्माण की गति को और तेज करने की आवश्यकता है। उन्होंने सफल नागरिकों से अपने जीवन में नागरिक कर्तव्यों और सामाजिक शिष्टाचार को अपनाने का आह्वान किया।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत को विश्वगुरु बनाने का सपना किसी एक संस्था, व्यक्ति या वर्ग के प्रयासों से पूरा नहीं होगा। इसके लिए समाज के प्रत्येक वर्ग को अपनी भूमिका निभानी होगी। सामूहिक प्रयास, सामाजिक सहयोग और राष्ट्रीय चेतना ही भारत को उसके गौरवशाली लक्ष्य तक पहुंचा सकते हैं।

पारंपरिक खेलों और योग ने बांधा समां
समापन समारोह का सबसे आकर्षक हिस्सा विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत सामूहिक प्रदर्शन रहा। शिक्षार्थियों ने भारतीय पारंपरिक खेलों, नियुद्ध, दंड-युद्ध, व्यायाम-योग, योगासन और घोष का प्रभावशाली प्रदर्शन किया।

इन प्रस्तुतियों में अनुशासन, सामूहिक समन्वय और शारीरिक दक्षता का अद्भुत संगम दिखाई दिया। कार्यक्रम में उपस्थित अभिभावकों और अतिथियों ने विद्यार्थियों की ऊर्जा, आत्मविश्वास और प्रशिक्षण स्तर की सराहना की। इन प्रदर्शनों ने यह भी दर्शाया कि आधुनिक शिक्षा के साथ भारतीय परंपराओं और शारीरिक संस्कारों का समन्वय किस प्रकार युवाओं के सर्वांगीण विकास में योगदान दे सकता है।

युवाओं के कंधों पर राष्ट्र का भविष्य
समारोह की मुख्य अतिथि ‘उड़ान’ की अध्यक्ष एवं निदेशक मधु सूरी ने युवाओं को देश की सबसे बड़ी शक्ति बताते हुए कहा कि आने वाले समय में राष्ट्र निर्माण और समाज के नेतृत्व की जिम्मेदारी इसी पीढ़ी के हाथों में होगी।

उन्होंने विद्यार्थियों से सामाजिक समरसता, परिवार प्रबोधन, पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली, नागरिक कर्तव्य पालन और स्वदेशी जैसे ‘पंच परिवर्तन’ के मूल्यों को अपने जीवन का हिस्सा बनाने का आह्वान किया। उनका कहना था कि यदि युवा इन मूल्यों को व्यवहार में उतारें, तो समाज में सकारात्मक बदलाव की मजबूत नींव रखी जा सकती है।

संघ के उद्देश्य और प्रशिक्षण की परंपरा
कार्यक्रम में दिल्ली प्रान्त संघचालक डॉ. अनिल अग्रवाल तथा संघ शिक्षा वर्ग के सर्वाधिकारी सुरेन्द्र राणा सहित बड़ी संख्या में स्वयंसेवक, अभिभावक और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

गौरतलब है कि वर्ष 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य भारत को परम वैभव की ओर ले जाना है। इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संघ शिक्षा वर्गों का आयोजन किया जाता है, जहां कार्यकर्ताओं को शारीरिक, बौद्धिक और संगठनात्मक प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है।

संस्कार, सेवा और अनुशासन का पंद्रह दिवसीय अभ्यास
पंद्रह दिनों तक चले इस प्रशिक्षण वर्ग में विद्यार्थियों को नियमित शारीरिक अभ्यास, बौद्धिक सत्र, सामूहिक जीवन और अनुशासित दिनचर्या का प्रशिक्षण दिया गया। इसके साथ ही उनमें संवेदनशीलता, सेवाभाव, सामाजिक समरसता और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित करने पर विशेष बल दिया गया।

यह प्रशिक्षण केवल शारीरिक दक्षता बढ़ाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका उद्देश्य ऐसे युवाओं का निर्माण करना था जो समाज की आवश्यकताओं को समझें, चुनौतियों का सामना करें और राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानकर कार्य करें।

एक बड़ा सवाल और भविष्य की दिशा
समापन समारोह के संदेश में केवल एक प्रशिक्षण वर्ग की सफलता नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की एक व्यापक परिकल्पना दिखाई देती है। सवाल यह है कि क्या देश का हर युवा अनुशासन, सेवा, संवेदनशीलता और कर्तव्यबोध जैसे मूल्यों को अपने जीवन का आधार बना पाएगा? यदि इसका उत्तर ‘हाँ’ है, तो विश्वगुरु भारत का सपना केवल एक नारा नहीं रहेगा, बल्कि एक ऐसी वास्तविकता बनेगा जिसे दुनिया सम्मान और आश्चर्य के साथ देखेगी। 
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