बिना समझौते केस बंद करना लोक अदालत का अधिकार नहीं, हाईकोर्ट ने 2014 का अवॉर्ड किया रद्द
बिलासपुर। ठेका कर्मचारी की काम के दौरान हुई मौत के बाद परिजनों को मुआवजा देने से जुड़े मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लोक अदालत के फैसले को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पक्षकारों के बीच सहमति या समझौता हुए बिना लोक अदालत किसी पक्ष को राहत देकर मामले का निपटारा नहीं कर सकती। कोर्ट ने वर्ष 2014 में लोक अदालत की ओर से पारित अवॉर्ड को निरस्त करते हुए मामले की दोबारा सुनवाई का आदेश दिया है।
मामला छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) से जुड़ा है। कंपनी की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर लोक अदालत के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें ठेकेदार को मुआवजे की जिम्मेदारी से राहत दी गई थी। CSPDCL का कहना था कि कर्मचारी की काम के दौरान मौत हुई थी और मुआवजे की जिम्मेदारी ठेकेदार की थी। इसके बावजूद लोक अदालत ने बिना संबंधित पक्षों की सहमति के ठेकेदार को राहत दे दी।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि लोक अदालत की कार्यवाही समझौते और पक्षकारों की सहमति पर आधारित होती है। यदि पक्षकारों के बीच समझौता नहीं होता है तो लोक अदालत को अपने स्तर पर किसी पक्ष को राहत देकर विवाद का अंतिम निपटारा करने का अधिकार नहीं है। ऐसी स्थिति में मामला उसी संबंधित न्यायालय या फोरम में वापस भेजा जाना चाहिए, जहां से वह लोक अदालत में आया था।
हाईकोर्ट ने इसी आधार पर वर्ष 2014 में पारित लोक अदालत के अवॉर्ड को रद्द कर दिया। कोर्ट ने मामले को संबंधित लेबर कोर्ट में वापस भेजते हुए नए सिरे से सुनवाई करने का निर्देश दिया है। अदालत ने यह भी कहा है कि मामले की दोबारा सुनवाई की प्रक्रिया को पांच महीने के भीतर पूरा कर फैसला किया जाए।
मामला एक ठेका कर्मचारी की काम के दौरान हुई मौत के बाद मुआवजे को लेकर शुरू हुआ था। कर्मचारी के परिजन मुआवजे की मांग कर रहे थे। वहीं, CSPDCL की ओर से यह तर्क दिया गया कि मुआवजा देने की जिम्मेदारी संबंधित ठेकेदार की है। मामला लोक अदालत पहुंचा, जहां ठेकेदार को राहत दी गई। अब हाईकोर्ट ने उस अवॉर्ड को रद्द करते हुए मामले की दोबारा सुनवाई का रास्ता खोल दिया है।