आश्रम और धर्मशालाओं के साथ वाराणसी का गंगा घाट अहिल्याबाई की देनः विशाखा
- एनएच गोयल स्कूल में वाद-विवाद के साथ मनाया गया अहिल्याबाई होल्कर की 300वीं जयंती वर्ष
- मुख्य वक्ता के रुप में पहुंची महाराष्ट्र मंडल की महिला प्रमुख विशाखा तोपखानेवाले
रायपुर। अपनी रियासत क्षेत्र में अनाथ आश्रम, धर्मशालाएं बनवाने के साथ काशी विश्वनाथ वाराणसी का गंगा घाट रानी अहिल्याबाई होल्कर की देन है। वे रानी होकर भी स्वयं सादगी से जीवन व्यतीत करती थीं। वे नारी जाति के लिए एक प्रेरणा रहीं। उन्होंने पति और ससुर की मृत्यु के बाद अपने राज्य की गद्दी संभाली और ऐसे शासन का उदाहरण पेश किया जो सबके सामने एक आदर्श रहा। उक्ताशय के विचार राजधानी स्थित एनएच गोयल स्कूल में आयोजित वाद-विवाद प्रतियोगिता और रानी अहिल्याबाई होल्कर की 300वीं जयंती समारोह के अवसर पर कहीं।
मुख्य वक्ता तोपखानेवाले ने बच्चों को बताया कि अहिल्याबाई का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमदनगर के एक छोटे से चौड़ी नामक गांव में हुआ था। इंदौर राज्य के संस्थापक महाराजा मल्हार राव एक दिन कहीं प्रवास पर जा रहे थे. तब उन्हें एक मंदिर से सुंदर गाने की आवाज सुनाई दी। उन्होंने अपना रथ रोका और लोगों से पूछा की आवाज कहां से आ रही है। तब लोगों ने कहा आप नहीं जानते यह तो अहिल्याबाई है। मल्हार राव ने कहा कि मैं उनसे मिलना चाहता हूं उन्होंने जब अहिल्याबाई को दिखा तो उनके चेहरे का तेज और उनके जवाब देने की शैली बुद्धिमत्ता को देखकर वह बहुत प्रसन्न हुए उन्होंने कहा कि मैं आपके पिता से मिलना चाहता हूं। मल्हार राव ने उनके पिता से मिलकर सामने उनके सामने प्रस्ताव रखा कि मैं अहिल्याबाई को अपना पुत्र वधू बनाना चाहता हूं। उनका विवाह इंदौर राज्य के संस्थापक महाराजा मल्हार राव होलकर के पुत्र खंडेराव के साथ हुआ। इस तरह एक गरीब किसान की बेटी होलकर परिवार के महारानी बनी। राजमाता जीजाऊ, रानी लक्ष्मी बाई उनके साथ एक नाम और जुड़ गया पुण्य श्लोका का अहिल्याबाई होलकर । पुण्यश्लोक का उपाधि हर किसी को नहीं मिलती है यह जनता द्वारा दी गई उपाधि है। यह महारानी अहिल्याबाई होल्कर को उनके प्रजा द्वारा उपाधि दी गई थी। इससे पूर्व स्कूल में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वरदान या अभिशाप विषय पर वाद-विवाद प्रतियोगिता हुई। जिसमें बच्चों ने अपने विचार खुलकर रखें।