छत्तीसगढ़

मेरी जापान डायरी: 3.... राख से शिखर तक तकनीक और परंपरा

डॉ. अभया जोगलेकर

उगते सूरज का देश- जापान, जिसे 'निहोन' या 'निप्पॉन' भी कहा जाता है। अपनी भौगोलिक स्थिति और सांस्कृतिक गौरव के कारण दुनिया भर में 'उगते सूरज का देश' (लैंड ऑफ राइजिंग सन) के नाम से प्रसिद्ध है। जापान की अक्षीय स्थिति पूर्वीय होने के कारण यहां सूरज की किरण सबसे पहले पड़ती है। जब हम टोक्यो पहुंचे, तो अत्यधिक वर्षा के कारण लगा की हम सूर्योदय नहीं देख पाएंगे। परन्तु दो दिनों के टोक्यो पड़ाव के बाद जब हम कोबे पहुंचे, तो अपने ऊपर विश्वास नहीं हुआ। होटल के जिस कमरे में हम रुके थे, उसकी खिड़की समुद्र की ओर खुलती थी। सुबह- सुबह जैसे ही सूरज की रोशनी कमरे पर पड़ी, तो लगा पैसे वसूल हो गये। वो क्षण अद्भुत था... वो भावनाएं मन को विचलित कर रही थीं। सूर्य की सुनहरी किरणें समुद्र पर इस प्रकार फ़ैल रहीं थीं, मानो वो समुद्र का श्रृंगार कर रहीं हों। मन बार- बार विकास (अपने दिवंगत पति) को याद कर रहा था। मै हर यात्राओं में उन्‍हें वीडियो से वो जगह दिखाती थी, तो ऐसा लगता था कि मेरे साथ वो भी ये सब देख रहे हैं। आज मेरे साथ मेरे हमसफ़र… मेरे दोस्‍त नहीं हैं, जिसके साथ ये क्षण बांट सकूं।

परमाणु विभीषिका से नव-निर्माण:

यात्रा के अंतिम पड़ाव पर हमें बिजली की रफ़्तार से चलने वाली बुलेट ट्रैन में बैठने का भी मौका मिला। कोबे से हिरोशिमा (करीब 305 किमी) और वापस हिरोशिमा से कोबे की सवा दो घंटे की बुलेट यात्रा ने रोमांचित किया। हिरोशिमा स्टेशन पर पहुंच कर यह अनुभव ही नहीं हुआ की इस शहर ने विभीषिका झेली है। छह अगस्त 1945 को 8:10 बजे हुई इस घटना ने द्वितीय युद्ध का परिदृश्य ही बदल दिया था। म्यूजियम और शांति पार्क का भ्रमण करते हुए उस समय की इकलौती बिल्डिंग के टूटे हिस्से को देखने का मौका मिला। परमाणु हमले में कारपोरेशन बिल्डिंग का केवल एक डोम बचा है।

म्यूजियम, जहां विभीषिका या इतिहास का वर्णन करते हैं, तो बाहर पार्क में सतत् जलने वाली ज्योति सोचने पर मजबूर करती है कि‍ वास्तविकता क्या है, द्वितीय विश्व युद्ध में परमाणु हमले की अकल्पनीय त्रासदी झेलने के बाद, जापान ने अपनी राख से उठकर दुनिया को चौंका दिया है। वहां की गगनचुंबी इमारतें, बगीचे, फ्लाईओवर के जाल देखकर यह विशवास करना कठिन था कि‍ यहां ऐसा भयानक मंजर हुआ था। आज का हिरोशिमा ऐसा दिखा, जिसने इस देश को शांति और प्रगति का वैश्विक प्रतीक बना दिया।

जिजीविषा और पुनरुत्थान की एक गाथा है। जापान ने सिखाया कि घाव कितने ही गहरे क्यों न हों, साहस से नया इतिहास लिखा जा सकता है। प्रतिदिन उगता सूरज एक नई आशा और प्रेरणा देता है। यही इनकी प्रगति का भी द्योतक है।

तकनीक और परंपरा का संगम:

जापान में तकनीक और परंपरा का संगम देखने को मिला। यहां एक ओर गगनचुंबी इमारतें, फ्लाई ओवर,  'शिंकांसेन' (बुलेट ट्रेन) की बिजली जैसी रफ़्तार है, तो दूसरी ओर श्राइन बौद्ध मंदिरों की असीम शांति है। सदियों पुरानी 'टी सेरेमनी', सूमो शो अपनी जड़ों के प्रति उनके गहरे सम्मान को दर्शाती है। कंक्रीट के जंगलों के बीच, फुजि यम, 'साकुरा' (चेरी ब्लॉसम) का खिलना, अराशियामा बैंबू ग्रोव, फ्लोटिंग तोरी गेट और उनके प्रति गहरा अनुराग यह बताता है कि तकनीक की अंधी दौड़ में भी जापानियों ने अपनी संस्‍कृति, परंपरा, प्रकृति और संवेदनाओं को संजोकर रखा है।

जापान केवल एक देश नहीं, एक 'वैश्विक प्रेरणा' है। यह हमें सिखाता है कि समय कितना भी कठिन हो, अनुशासन और इच्छाशक्ति के बल पर कोई भी राष्ट्र शून्य से सृजन तक का अनुकरणीय सफर तय कर सकता है।