छत्तीसगढ़

जिला अस्पताल पर निजी साया! इलाज के नाम पर मुनाफे का खेल....

बिलासपुर – जिले का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल अब धीरे-धीरे निजी हाथों में जा रहा है… जी हां, अस्पताल कैंपस के भीतर ही एक महत्वपूर्ण विभाग को निजी डॉक्टरों और स्टाफ के हवाले करने की तैयारी जोरों पर है। सवाल उठता है कि क्या अब सरकारी अस्पताल सिर्फ नाम का रह जाएगा और इलाज का जिम्मा प्राइवेट संस्थाओं के पास चला जाएगा?

हैरानी की बात यह है कि जरूरतमंद मरीज बेहद कम शुल्क पर ईलाज कराने ससरकारी अस्पताल पहुँचते है।उन्हीं सुविधाओं के लिए अब उन्हें प्राइवेट अस्पतालों का रास्ता दिखाया जा रहा है। यानी गरीब और मध्यम वर्ग के मरीजों को महंगा इलाज कराने मजबूर किया जा रहा है। क्या यह व्यवस्था मरीजों के साथ सीधा खिलवाड़ नहीं है?

सरकार द्वारा नियम के तहत डॉक्टरों की नियुक्ति की जाती है,अगर ऐसा निजीकरण किया जाता हैं और अनुभवहीन लोगों के हाथ में मरीजों को सौंप दिया जाता है तो इन मरीजों के साथ यदि किसी तरह का खिलवाड़ होता है तो इसका जिम्मेदार कौन होगा यह सरकारी अस्पताल है बल्कि कोई प्रशिक्षण केंद्र नहीं है। अस्पताल में जरूरी संसाधन और सुविधाएं उपलब्ध कराने के बजाए जिला चिकित्सालय प्रशासन ने निजीकरण उचित समझा स्वास्थ्य विभाग की यही नीतियां धीरे-धीरे सरकारी सिस्टम को कमजोर कर रही हैं?

सूत्रों की मानें तो जिन सुविधाओं का अभाव जिला अस्पताल में है… वही सुविधाएं अब तेजी से निजी संस्थानों में शुरू हो रही हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या इसके पीछे कोई बड़ी लॉबी काम कर रही है… या फिर यह सब निजी लाभ पहुंचाने की सुनियोजित कोशिश है? आने वाले समय में और कौन-कौन सी सेवाएं निजी हाथों में जाएंगी… और इस पूरे खेल का जिम्मेदार कौन होगा—यह देखना अब बेहद अहम हो गया है। अब तो ऐसा लगने लगा है कि जिले में अब शहर के सिविल सर्जन सेवानिवृत्त होने के पूर्व स्वास्थ्य विभाग में कुछ इतिहास रचना चाहते हैं