पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई, गनियारी में पूरे सम्मान से हुआ अंतिम संस्कार
रायपुर। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्व पटल पर नई पहचान दिलाने वाली पंडवानी सम्राज्ञी पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई रविवार को पंचतत्व में विलीन हो गईं। उनके पैतृक गांव गनियारी में पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। पुलिस के गार्ड ऑफ ऑनर, राष्ट्रीय ध्वज में लिपटे पार्थिव शरीर और हजारों लोगों की मौजूदगी ने इस विदाई को ऐतिहासिक और भावनात्मक बना दिया।राजकीय सम्मान के साथ हुई अंतिम यात्रा में प्रशासन, जनप्रतिनिधि, लोक कलाकार, साहित्यकार, उनके शिष्य और बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए। पूरे क्षेत्र में शोक का माहौल रहा और हर आंख नम नजर आई।
डॉ. तीजन बाई के पार्थिव शरीर को राष्ट्रीय ध्वज में लपेटकर अंतिम दर्शन के लिए रखा गया। प्रदेश सरकार की ओर से उन्हें राजकीय सम्मान प्रदान किया गया। पुलिस जवानों ने गार्ड ऑफ ऑनर देकर देश और प्रदेश की ओर से महान लोक कलाकार को अंतिम सलामी दी। जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने पुष्पचक्र अर्पित कर श्रद्धांजलि दी।
राजकीय सम्मान के साथ निकली अंतिम यात्रा में हजारों लोग शामिल हुए। “तीजन बाई अमर रहें” और “अमर रहे” के नारों के बीच उनका पार्थिव शरीर मुक्तिधाम तक पहुंचा। गनियारी स्थित मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार के दौरान वातावरण बेहद भावुक हो गया। उनके शिष्यों और लोक कलाकारों ने “चोला माटी के हे राम, एकर का भरोसा…” गीत गाकर अपनी गुरु को अंतिम प्रणाम किया। पंडवानी की स्वर लहरियों के बीच हर किसी की आंखें नम हो गईं।
डॉ. तीजन बाई के मंझले बेटे दिलहरण पारधी ने उन्हें मुखाग्नि दी। इस दौरान उनके पति तुलसी राम देशमुख सहित पूरा परिवार मौजूद रहा। परिजनों ने बताया कि उनकी अंतिम इच्छा थी कि वे सुहागिन के रूप में ही इस संसार से विदा लें, जिसे परिवार ने पूरी श्रद्धा और सम्मान के साथ पूरा किया।
अंतिम संस्कार से पहले विभिन्न जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों ने उनके पार्थिव शरीर पर पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। सभी ने एक स्वर में कहा कि डॉ. तीजन बाई ने अपनी कला से छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई और उनका योगदान सदैव अमर रहेगा।
8 अगस्त 1956 को गनियारी गांव में जन्मी डॉ. तीजन बाई ने कठिन संघर्षों के बीच अपनी कला को निखारा। उन्होंने पंडवानी की पारंपरिक शैली से अलग हटकर कापालिक शैली को अपनाया और अपने सशक्त अभिनय व प्रभावशाली गायन से इस लोककला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
उनकी प्रस्तुति केवल भारत तक सीमित नहीं रही। पेरिस, लंदन, टोक्यो सहित दुनिया के कई देशों में उन्होंने पंडवानी की गूंज पहुंचाई और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच पर स्थापित किया।
भारतीय लोककला में अतुलनीय योगदान के लिए डॉ. तीजन बाई को 1988 में पद्मश्री, 2003 में पद्मभूषण और 2019 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, गांधी रत्न सम्मान और जापान का प्रतिष्ठित फुकुओका पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए।
राजकीय सम्मान के साथ दी गई अंतिम विदाई इस बात का प्रतीक है कि डॉ. तीजन बाई केवल छत्तीसगढ़ की नहीं, बल्कि पूरे देश की सांस्कृतिक धरोहर थीं। उनकी आवाज भले ही शांत हो गई हो, लेकिन पंडवानी की वह अमर गूंज, जिसने गांव की चौपाल से लेकर विश्व के प्रतिष्ठित मंचों तक भारत की लोकसंस्कृति का परचम लहराया, आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी।