छत्तीसगढ़

हाईकोर्ट: मठ की संपत्ति पर किसका हक? हाई कोर्ट ने खारिज की याचिका, 5 साल पुरानी देरी ने भी बिगाड़ा मामला

रायपुर। रायपुर के प्रसिद्ध श्री ठाकुर रामचंद्र जी स्वामी जैतूसाव मठ पब्लिक ट्रस्ट की संपत्तियों को लेकर चल रहा विवाद हाई कोर्ट तक पहुंचा, लेकिन अदालत ने याचिकाकर्ता को राहत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने साफ किया कि राजस्व रिकॉर्ड में कलेक्टर का नाम मैनेजर/सर्वराकार के रूप में दर्ज होना ट्रस्ट की संपत्ति पर किसी व्यक्ति के वास्तविक अधिकार का अंतिम फैसला नहीं है।

जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल ने याचिका खारिज करते हुए यह भी कहा कि यदि याचिकाकर्ता सक्षम न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष सर्वराकार पद अथवा अपने अधिकार को साबित कर देता है, तो राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज प्रविष्टियां उस निर्णय के अधीन रहेंगी।

यह याचिका जैतूसाव मठ, पुरानी बस्ती रायपुर निवासी महंत राम आशीष दास ने दायर की थी। उन्होंने खुद को दिवंगत महंत राम भूषण दास का शिष्य बताते हुए वसीयत, गोद लेने के दस्तावेज और सर्वराकार के रूप में नियुक्ति से जुड़े दस्तावेजों के आधार पर ट्रस्ट की संपत्तियों पर अपना दावा पेश किया था।

महंत राम भूषण दास की 16 नवंबर 2007 को मृत्यु हुई थी। वे उस समय ट्रस्ट के सर्वराकार थे। मामला ट्रस्ट की भरेंगा और भटगांव स्थित कृषि भूमि सहित अन्य संपत्तियों के राजस्व रिकॉर्ड से जुड़ा था। कलेक्टर का नाम दर्ज होने से शुरू हुआ विवाद मामले में महेंद्र कुमार अग्रवाल की ओर से ट्रस्ट की संपत्तियों के राजस्व रिकॉर्ड से दिवंगत महंत का नाम हटाकर कलेक्टर का नाम दर्ज करने की मांग की गई थी। तहसीलदार ने 13 अक्टूबर 2010 को यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया था कि मामला पहले से न्यायालय और रजिस्ट्रार के समक्ष लंबित है।

इसके बाद 21 मार्च 2012 को एसडीओ ने बिना याचिकाकर्ता को नोटिस दिए कलेक्टर का नाम दर्ज करने का निर्देश दिया। इसके खिलाफ की गई अपील भी खारिज हुई। बाद में संभागायुक्त ने 5 दिसंबर 2014 को आदेश को निरस्त कर दिया। हालांकि, राजस्व मंडल ने 28 अप्रैल 2016 को संभागायुक्त का आदेश पलट दिया और एसडीओ तथा कलेक्टर के आदेश बहाल कर दिए।

पांच साल से ज्यादा की देरी भी बनी वजह

हाई कोर्ट ने मामले में केवल राजस्व रिकॉर्ड की प्रविष्टि पर ही विचार नहीं किया, बल्कि याचिका दाखिल करने में हुई देरी को भी महत्वपूर्ण माना। राजस्व मंडल के 28 अप्रैल 2016 के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका 28 अगस्त 2021 को दाखिल की गई। यानी याचिका पांच साल से ज्यादा की देरी के बाद अदालत पहुंची। कोर्ट ने कहा कि इस देरी का कोई संतोषजनक कारण नहीं बताया गया। इस आधार पर भी याचिकाकर्ता को राहत देने का आधार नहीं बनता।

पुजारी को संपत्ति का मालिक नहीं माना जा सकता

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुजारी उत्थान एवं कल्याण समिति मामले में निर्धारित सिद्धांत का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि किसी मंदिर या धार्मिक संपत्ति के प्रबंधन का अधिकार रखने वाला पुजारी अथवा सर्वराकार उस संपत्ति का स्वतंत्र मालिक नहीं बन जाता। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी।

लेकिन मालिकाना हक का अंतिम फैसला नहीं

हाई कोर्ट के आदेश का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि राजस्व रिकॉर्ड में कलेक्टर का नाम दर्ज होने को ट्रस्ट की संपत्ति अथवा सर्वराकार पद के वास्तविक अधिकारों का अंतिम निर्धारण नहीं माना गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि महंत राम आशीष दास किसी सक्षम न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष अपना अधिकार साबित करते हैं, तो मौजूदा राजस्व प्रविष्टियां उस निर्णय के अधीन रहेंगी। यानी हाई कोर्ट ने इस स्तर पर राजस्व रिकॉर्ड की प्रविष्टि में हस्तक्षेप नहीं किया, लेकिन संपत्ति पर वास्तविक अधिकार का अंतिम निर्णय सक्षम न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष होने वाली कार्यवाही पर निर्भर रहेगा।