छत्तीसगढ़

हाई कोर्ट ने कंपनी की ब्लैकलिस्टिंग का आदेश किया रद्द, पुलिस विभाग को 30 दिन में जवाब लेने का निर्देश

रायपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पुलिस विभाग के लिए संचार टावर लगाने वाली दिल्ली की कंपनी एप्लाइड कम्युनिकेशंस एंड कंट्रोल्स को ब्लैकलिस्ट करने के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने जैसी गंभीर कार्रवाई से पहले उसे अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना आवश्यक है। अलग से कारण बताओ नोटिस जारी किए बिना की गई कार्रवाई को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

मुख्य न्यायाधीश कृष्न राम महापात्र और न्यायमूर्ति संतोष शर्मा की खंडपीठ ने कंपनी को 30 दिन के भीतर अपना जवाब प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। जवाब मिलने के बाद पुलिस विभाग नियमानुसार आगे की कार्रवाई कर सकेगा। मामले में कंपनी के प्रोपराइटर शिव कुमार शर्मा ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर ब्लैकलिस्ट करने के आदेश को चुनौती दी थी। याचिका के अनुसार, कंपनी को पुलिस विभाग के लिए कुल 33 संचार टावर स्थापित करने का ठेका दिया गया था। कंपनी का दावा था कि उसने निर्धारित समय सीमा में काम पूरा कर लिया, लेकिन विभाग ने केवल 13 टावरों का भुगतान किया। शेष 20 टावरों के संबंध में पुलिस विभाग ने निविदा की शर्तों के अनुरूप काम नहीं होने का हवाला देते हुए भुगतान रोक दिया। बकाया राशि को लेकर दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता की कार्यवाही भी लंबित है।

कंपनी के मुताबिक, पुलिस विभाग ने 26 फरवरी 2026 को पत्र जारी कर कथित कमियों को 15 मार्च तक दूर करने के निर्देश दिए थे। पत्र में चेतावनी दी गई थी कि निर्धारित समय में कमियां दूर नहीं करने पर कंपनी की सुरक्षा राशि जब्त करने के साथ उसे ब्लैकलिस्ट भी किया जा सकता है। इसके बाद 16 जून 2026 को कंपनी को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। कंपनी ने हाई कोर्ट में दलील दी कि कमियां दूर करने के लिए जारी पत्र को ब्लैकलिस्ट करने की प्रस्तावित कार्रवाई के संबंध में अलग कारण बताओ नोटिस नहीं माना जा सकता। कंपनी के अनुसार, उसे ब्लैकलिस्ट किए जाने से पहले अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं दिया गया।

राज्य  सरकार की ओर से कंपनी की दलीलों का विरोध किया गया। विभाग ने कोर्ट को बताया कि कंपनी को 20 टावरों में पाई गई कमियों को दूर करने का अवसर दिया गया था। साथ ही, उसे चेतावनी भी दी गई थी कि निर्धारित समय में सुधार नहीं होने पर सुरक्षा राशि जब्त करने और ब्लैकलिस्ट करने की कार्रवाई की जा सकती है। विभाग के अनुसार, कंपनी ने 12 अगस्त 2025 को लिखे पत्र में स्वीकार किया था कि टावरों का निर्माण निर्धारित तकनीकी शर्तों के अनुरूप नहीं हुआ था। कंपनी ने उस समय कमियां दूर करने के लिए अतिरिक्त समय भी मांगा था। विभाग का तर्क था कि कंपनी को कार्रवाई से पहले सुधार का अवसर दिया जा चुका था।

हाई कोर्ट ने मामले में ब्लैकलिस्ट करने से पहले उचित प्रक्रिया का पालन किए जाने और कंपनी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए जाने के महत्व को रेखांकित किया। कोर्ट के आदेश के अनुसार, कंपनी अब 30 दिन के भीतर अपना जवाब पुलिस विभाग के समक्ष पेश कर सकेगी। इसके बाद विभाग जवाब पर विचार करते हुए नियमानुसार आगे की कार्रवाई कर सकेगा।