धान की सुनहरी बालियों से सजा माँ अन्नपूर्णा का दरबार
2025-11-27 10:05 AM
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वाराणसी| वाराणसी की पावन धरती पर माँ अन्नपूर्णा का 17 दिन का महाव्रत बुधवार को भक्तिभाव और परंपरा की गरिमा के साथ सम्पन्न हुआ। यह व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पूर्वांचल की कृषि संस्कृति और किसानों की आस्था का जीवंत प्रतीक है। हर वर्ष किसान अपनी पहली धान की बालियाँ माता के चरणों में अर्पित कर आने वाले कृषि वर्ष के लिए आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
आस्था और अन्न-समृद्धि का संगम
अन्नपूर्णा मंदिर का वातावरण इस अवसर पर आध्यात्मिक ऊर्जा और ग्रामीण समृद्धि से सराबोर रहा। मंदिर परिसर को कुंतलों धान की सुनहरी बालियों से सजाया गया। गर्भगृह से लेकर प्रांगण तक हर द्वार और तोरण पर प्राकृतिक श्रृंगार ने यह संदेश दिया कि अन्न ही जीवन का आधार है और उसकी रक्षा ही सच्ची भक्ति है।
काशी विश्वनाथ धाम में विशेष पूजन
श्री काशी विश्वनाथ धाम में भी माँ अन्नपूर्णा के इस महाव्रत का समापन विशेष पूजन के साथ हुआ। श्रद्धालुओं ने माता से कामना की कि हर घर में अन्न की समृद्धि बनी रहे और जीवन शुभता से परिपूर्ण हो। धान की बालियों से सजे मंदिर ने कृषि और आस्था का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया।
कठोर व्रत की परंपरा
महंत शंकर पुरी ने बताया कि यह महाव्रत अत्यंत कठिन माना जाता है। व्रती 17 दिन तक 17 गांठों और धागों का संकल्प धारण करते हैं, जो मन, वचन और कर्म की पवित्रता का प्रतीक है। इस अवधि में वे केवल एक समय फलाहार करते हैं, जिसमें नमक तक का प्रयोग नहीं होता। इसका उद्देश्य शरीर को संयमित करना और मन को सात्त्विक भाव से परिपूर्ण करना है।
भक्तिभाव से उमड़ा जनसैलाब
उद्यापन के दिन सुबह से ही मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी। मंगला आरती के बाद धान की बालियों से विशेष मंडप सजाया गया, जहाँ माँ अन्नपूर्णा की प्रतिमा का भव्य श्रृंगार हुआ। संध्या आरती और भोग में अन्न-समृद्धि के प्रतीक खाद्यान्न, फल और पारंपरिक पकवान अर्पित किए गए।
काशी में सम्पन्न हुआ यह महाव्रत केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि किसानों की मेहनत, ग्रामीण जीवन की समृद्धि और भारतीय संस्कृति की गहराई का उत्सव है। माँ अन्नपूर्णा का यह दरबार हर वर्ष यह संदेश देता है कि अन्न ही जीवन है और उसकी कृतज्ञता ही सच्ची भक्ति है।