माघ मेले से काशी तक: शंकराचार्य का असमय प्रस्थान, विवाद अब हाईकोर्ट की चौखट पर
2026-01-29 02:11 PM
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प्रयागराज| प्रयागराज के माघ मेले की पवित्रता और परंपरा के बीच बुधवार को एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अचानक माघ मेला छोड़ने का ऐलान कर दिया और काशी के लिए रवाना हो गए। यह निर्णय न केवल धार्मिक जगत में हलचल पैदा कर रहा है, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है।
11 दिनों की उठापटक के बाद निर्णायक कदम
करीब ग्यारह दिनों से लगातार बयानबाज़ी, विवाद और प्रशासनिक गहमा-गहमी का दौर चल रहा था। इसी बीच शंकराचार्य ने व्यथित मन से माघ मेला छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि हालात ऐसे हो गए थे कि अब यहां रुकना संभव नहीं रहा। यह कदम उन्होंने मेले की समाप्ति से 18 दिन पहले उठाया, जबकि आयोजन 15 फरवरी तक जारी रहना है।
प्रशासनिक प्रस्ताव और उसका अस्वीकार
मंगलवार को माघ मेला प्रशासन ने शंकराचार्य को एक प्रस्ताव भेजा था। इसमें उन्हें पालकी में बैठाकर संगम ले जाने, स्नान कराने और फूलों की वर्षा करने का आश्वासन दिया गया था। लेकिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इसे ठुकरा दिया। उनके शब्दों में, “जब दिल में दुख और गुस्सा हो, तो पवित्र जल भी मन को शांति नहीं दे पाता। सम्मान दिखावे से नहीं, आचरण से होता है।” यह बयान प्रशासनिक प्रयासों पर सीधा सवाल है।
विवाद का न्यायिक मोड़
मामला अब इलाहाबाद हाईकोर्ट तक पहुंच गया है। शंकराचार्य के अधिवक्ता गौरव द्विवेदी ने मुख्य न्यायाधीश को लेटर पिटीशन भेजी है। इसमें पूरे घटनाक्रम की सीबीआई जांच की मांग की गई है। याचिका में प्रशासनिक भूमिका और विवाद से जुड़े सभी पहलुओं की निष्पक्ष पड़ताल की अपील की गई है। इससे साफ है कि विवाद अब केवल धार्मिक या सामाजिक नहीं, बल्कि कानूनी दायरे में भी प्रवेश कर चुका है।
अधूरे पर्व और अधूरी उपस्थिति
माघ मेला अभी 15 फरवरी तक चलेगा। दो प्रमुख स्नान पर्व—माघी पूर्णिमा (1 फरवरी) और महाशिवरात्रि (15 फरवरी)—शेष हैं। ऐसे समय में शंकराचार्य का प्रस्थान धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। संत समाज और श्रद्धालुओं के बीच इस फैसले को लेकर चर्चा तेज है कि क्या इससे मेले की आध्यात्मिक गरिमा प्रभावित होगी।