रायपुर

छत्तीसगढ़ सिविल सोसायटी ने छत्रपति शिवाजी महाराज की 'वाघ नख' और 'जगदंबा तलवार' की वापसी की मांग, किंग चार्ल्स तृतीय को लिखा पत्र

 रायपुर। सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी के दो छोटे साहिबजादों जोरावर सिंह और फतेह सिंह के सर्वोच्च बलिदान को सम्मान देने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल की थी, जिसके परिणामस्वरूप 'वीर बाल दिवस' की घोषणा की गई। अपनी इस अभियान के बाद छत्तीसगढ़ सिविल सोसायटी (Chhattisgarh Civil Society) ने छत्रपति शिवाजी महाराज के छत्रपति शिवाजी महाराज की 'वाघ नख' और उनकी प्राणप्रिय 'जगदंबा तलवार' की तत्काल वापसी की मांग की है।

छत्तीसगढ़ सिविल सोसायटी के संयोजक डा. कुलदीप सोलंकी ने बताया कि सोसायटी की ओर से ब्रिटिश ताज को अल्टीमेटम दिया गया है। वे छत्रपति शिवाजी महाराज की 'वाघ नख' और 'जगदंबा तलवार' जैसी हमारी 'हमारी धरोहरें लौटाए, वरना कानूनी युद्ध के साथ 5 ट्रिलियन डॉलर का जुर्माना' भरना होगा। उन्होंने इसे लेकर ब्रिटेन के किंग चार्ल्स तृतीय को कड़ा पत्र लिखा है। जिसमें उन्होंने  6 जून 2026 तक ये धरोहरें भारत को सम्मानपूर्वक नहीं लौटाने पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय जाने की चेतावनी दी है। इसके साथ भारत की 211 दुर्लभ कलाकृतियों की वापसी का एजेंडा भी तैयार किया गया है।

डा. सोलंकी ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक संप्रभुता के सम्मान और औपनिवेशिक काल में लूटी गई अपनी गौरवशाली विरासतों को वापस पाने के लिए अब देश का जनमानस मुखर हो गया है। छत्तीसगढ़ सिविल सोसायटी ने ब्रिटेन के किंग चार्ल्स तृतीय को एक कड़ा पत्र लिखकर भारत की प्राचीन संपदाओं की वापसी के लिए 6 जून 2026 की 'अंतिम तिथि' तय कर दी है। इस पत्र ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई बहस छेड़ दी है।

छत्तीसगढ़ सिविल सोसायटी के संयोजक डॉ. कुलदीप सोलंकी ने किंग चार्ल्स को भेजे गए इस ऐतिहासिक पत्र में साफ कहा है कि ब्रिटिश संग्रहालय में प्रदर्शित भारतीय कलाकृतियां केवल वस्तुएं नहीं, बल्कि भारत की अस्मिता का हिस्सा हैं। पत्र में विशेष रूप से हिंदवी स्वराज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज की 'वाघ नख' और उनकी प्राणप्रिय 'जगदंबा तलवार' तथा उनके तैल चित्र इत्यादि की तत्काल वापसी की मांग की गई है।

डॉ. सोलंकी ने स्पष्ट किया कि अब समय आ गया है जब भारत अपनी उन निधियों को वापस ले, जो बलपूर्वक या छल से औपनिवेशिक शासन के दौरान ले जाई गई थीं। सोसायटी ने स्पष्ट किया है कि  यदि 6 जून 2026 तक ये धरोहरें भारत को सम्मानपूर्वक नहीं लौटाई गईं, तो सिविल सोसायटी अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) का दरवाजा खटखटाएगी।

केवल धरोहरों की वापसी ही नहीं, बल्कि पिछले कई दशकों से इन वस्तुओं के प्रदर्शन से ब्रिटेन द्वारा अर्जित किए गए राजस्व और ब्याज सहित 5 लाख ट्रिलियन डॉलर के ऐतिहासिक हर्जाने का भी दावा किया जाएगा।

यह संभवतः भारत की ओर से किसी भी विदेशी सत्ता को दी गई अब तक की सबसे बड़ी और स्पष्ट कानूनी चेतावनी है। डॉ. सोलंकी ने कहा, "इतिहास साक्षी है कि अन्याय की नींव पर खड़ा साम्राज्य स्थायी नहीं होता। आज का सशक्त और आत्मनिर्भर भारत अपनी गौरवशाली विरासत की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।" विशेषज्ञों का मानना है कि यह मांग केवल भावनात्मक नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत 'सांस्कृतिक संपत्ति की वापसी' (Restitution of Cultural Property) के वैश्विक आंदोलनों को और अधिक बल देगी।

सूची में शामिल हैं 211 बेशकीमती धरोहरें

केवल छत्रपति शिवाजी महाराज से जुड़ी वस्तुएं ही नहीं, बल्कि भारत की 211 दुर्लभ कलाकृतियों की वापसी का एजेंडा तैयार किया गया है। इनमें प्रमुख हैं:

    अमरावती स्तूप के अवशेष: लगभग 2,000 साल पुराने अमरावती मार्बल्स।

    होयसल कला: 12वीं-13वीं शताब्दी की नक्काशीदार मूर्तियां।

    शिव नटराज: चोल काल की विश्वप्रसिद्ध कांस्य प्रतिमाएं।

    सम्राट अशोक के शिलालेख: ब्राह्मी लिपि में अंकित भारतीय इतिहास के प्राचीनतम साक्ष्य।

    मुगल-राजपूत लघु चित्र: दरबारी जीवन और शौर्य गाथाओं को दर्शाते दुर्लभ पेंटिंग्स।

    धार्मिक मूर्तियां: भगवान गणेश, दुर्गा, सूर्य देव और विष्णु की प्राचीन प्रतिमाएं, साथ ही जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां।