रायपुर

’विशेष लेख’ : ’कोदो-कुटकी की खेती अपनाएं, पोषण और समृद्धि दोनों पाएं’

 

रायपुर %छत्तीसगढ़ की समृद्ध कृषि परंपरा में कोदो और कुटकी का विशेष महत्व रहा है। सदियों से आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के भोजन का अभिन्न हिस्सा रहे ये लघु धान्य आज एक बार फिर किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं। बदलती जलवायु परिस्थितियों, पोषण संबंधी चुनौतियों और बेहतर कृषि की आवश्यकता के बीच कोदो-कुटकी जैसी मिलेट फसलें भविष्य की खेती का मजबूत आधार बनकर उभर रही हैं।

    कोदो ¼पास्पलम स्क्रोबिकुलेटम½ और कुटकी ¼पैनिकम सुमाट्रेंस½ ऐसी फसलें हैं जिन्हें कम पानी] कम लागत और सीमित संसाधनों में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। यही कारण है कि ये छोटे और सीमांत किसानों के लिए आर्थिक सुरक्षा का माध्यम बन रही हैं। कम उपजाऊ] पथरीली और ढालू भूमि में भी इनकी खेती संभव है] जहां अन्य फसलें अपेक्षित उत्पादन नहीं दे पातीं। ^ये फसलें प्रायः हर एक प्रकार की भूमि में पैदा की जा सकती है। जिस भूमि में अन्य कोई धान्य फसल उगाना सम्भव नहीं होता वहाँ भी ये फसलें सफलता पूर्वक उगाई जा सकती है। हल्की भूमि में जिसमें पानी का निकास अच्छा हो इनकी खेती के लिए उपयुक्त होती है।*

    आज जब दुनिया स्वास्थ्यवर्धक भोजन की ओर लौट रही है, तब कोदो और कुटकी का महत्व और बढ़ गया है। कोदो में प्रोटीन] कार्बाेहाइड्रेट, आयरन और कैल्शियम प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं]जबकि कुटकी फाइबर] प्रोटीन] फास्फोरस तथा अन्य खनिज तत्वों से भरपूर होती है। विशेषज्ञों के अनुसार इनका नियमित सेवन मधुमेह] उच्च रक्तचाप] मोटापा और एनीमिया जैसी समस्याओं के नियंत्रण में सहायक हो सकता है। यही वजह है कि आज इन्हें ‘^सुपर फूड* के रूप में पहचान मिल रही है।

    छत्तीसगढ़ सरकार भी मिलेट फसलों को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। वर्ष 2026 में कोदो का न्यूनतम समर्थन मूल्य 3]200 रुपये प्रति क्विंटल तथा कुटकी का 3]350 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है। इससे किसानों को बेहतर मूल्य मिलने के साथ इन फसलों की खेती के प्रति उत्साह बढ़ा है। विभागीय जानकारी के अनुसार खरीफ वर्ष 2025 में प्रदेश में कोदो फसल 39-02 हेक्टेयर और कुटकी फसल 38-03 हेक्टेयर रकबे में लगाए गए थे। वैसे विगत खरीफ वर्ष में प्रति हेक्टेयर कोदो की उत्पादन 550 किलोग्राम तथा कुटकी की उत्पादन 675 किलोग्राम दर्ज की गई है। यानी कोदो की उत्पादन 21-46 टन थी] वहीं 25-67 टन कुटकी का उत्पादन हुआ था।

    मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने भी किसानों से धान के साथ-साथ कोदो, कुटकी और रागी जैसी फसलों की खेती अपनाने व उत्पादन बढ़ाने की अपील की है।

    कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि उन्नत तकनीकों को अपनाकर कोदो-कुटकी की उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है। ^मानसून की शुरुआत के साथ जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम पखवाड़े तक बुवाई, बीजोपचार, कतार पद्धति, संतुलित उर्वरक प्रबंधन तथा समय पर खरपतवार नियंत्रण जैसे उपाय किसानों को बेहतर उत्पादन दिला सकते हैं।*