रायपुर

रायपुर में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में श्रीमद्भागवत कथा का प्रथम दिवस

रायपुर। पूज्य देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के पावन सानिध्य में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा का भव्य एवं दिव्य शुभारंभ अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उल्लासपूर्ण वातावरण में हुआ। कथा के प्रथम दिवस पर ही बड़ी संख्या में भक्त दूर–दूर से कथा श्रवण करने पहुंचे। जैसे ही पूज्य महाराज श्री ने व्यासपीठ से अपनी अमृतवाणी में कथा का रसपान भक्तों को श्रवण कराना शुरु किया , संपूर्ण कथा पंडाल भक्तिरस से सराबोर हो गया। “जय श्री राधे-राधे” के गगनभेदी जयकारों से पूरा कथा पंडाल गूंज उठा और उपस्थित भक्तजन भाव-विभोर होकर भक्ति में लीन हो गए।
कथा में “नो तिलक, नो एंट्री।” का नियम बनाया है। बिना तिलक के कोई पूजा भगवान स्वीकार नहीं करते है। पूज्य महाराज श्री ने समस्त भक्तों से भावपूर्ण अनुरोध किया था कि जो भी भक्त कथा श्रवण के लिए पधारें, वे सिर पर तिलक लगाकर ही आएं, ताकि कोई बिधर्मी कथा में प्रवेश न करे। तिलक को भारतीय परंपरा में भक्ति, पवित्रता और ईश्वर के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है। कथा स्थल पर उपस्थित सभी श्रद्धालु तिलक धारण किए हुए नजर आए, जिससे संपूर्ण पंडाल एक दिव्य और सनातनी स्वरूप में परिवर्तित हो गया।
कलयुग के लोगो का कल्याण श्रीमद्भागवत से ही होगा। कलियुग में मनुष्य अनेक प्रकार की मोह-माया और अशांति से घिरा हुआ है। ऐसे समय में श्रीमद्भागवत कथा ही वह दिव्य साधन है जो मनुष्य के जीवन को सही दिशा प्रदान कर सकता है। भागवत कथा के श्रवण से हृदय में भगवान के प्रति प्रेम जागृत होता है, मन के विकार दूर होते हैं और जीवन में आध्यात्मिक चेतना का संचार होता है।जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास के साथ भागवत कथा का श्रवण करता है, उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने लगते हैं। कथा मनुष्य को धर्म, भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का मार्ग दिखाती है तथा उसे ईश्वर से जोड़ने का कार्य करती है।
राजस्थान के श्रीगंगानगर में 13 वर्षीय बालिका के साथ किए गए हैवानियत पर महाराज श्री ने गहरा दुःख और आक्रोश व्यक्त किया। महाराज श्री ने कहा कि ऐसे जघन्य अपराधों के दोषियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कठोर से कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि समाज में ऐसा अपराध करने का दुस्साहस कोई न कर सके और बेटियों की सुरक्षा सुनिश्चित हो। उन्होंने कहा, "आज ऐसी घटनाएँ इसलिए बढ़ रही हैं क्योंकि लोग अपने जीवन से धर्म, संस्कार और सदाचार को दूर करते जा रहे हैं। यदि घर-घर में रामायण, श्रीमद्भगवद्गीता और अन्य सनातन ग्रंथों का अध्ययन होगा, तो बच्चों और युवाओं में अच्छे संस्कार विकसित होंगे तथा समाज में अपराध और अनैतिकता में कमी आएगी।"
आज बहुत से लोग मंगलवार के दिन मांस और शराब का सेवन नहीं करते, लेकिन सप्ताह के बाकी दिनों में बिना किसी संकोच के वही सब करते हैं। यदि कोई कार्य एक दिन गलत है, तो वह बाकी दिनों में सही कैसे हो सकता है । भगवान ने कहीं यह नहीं कहा कि केवल मंगलवार को ही सात्विक बनो और शेष दिनों में मनमानी करो। सच्ची भक्ति का अर्थ है कि हमारे विचार, वाणी और आचरण हर दिन पवित्र रहें। यदि हम भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा रखते हैं, तो हमें केवल विशेष दिनों पर ही नहीं, बल्कि हर दिन नशे, हिंसा और बुरी आदतों से दूर रहने का प्रयास करना चाहिए।
यदि हमें निस्वार्थ सेवा का आदर्श सीखना है, तो वह हमें श्री हनुमान जी से सीखना चाहिए। हनुमान जी ने अपने जीवन में कभी भी सेवा के बदले सम्मान, पद या पुरस्कार की इच्छा नहीं की। उनका एकमात्र उद्देश्य था—भगवान श्रीराम की आज्ञा का पालन और उनकी प्रसन्नता। आज लोग सेवा तो करते हैं, लेकिन कई बार उसके बदले प्रशंसा, सम्मान या प्रसिद्धि की अपेक्षा भी रखते हैं। जबकि हनुमान जी हमें सिखाते हैं कि सेवा तभी सफल होती है, जब उसमें निस्वार्थ भाव, विनम्रता और समर्पण हो।
बच्चों को संस्कार हमारे आचरण से प्राप्त होते हैं। यदि हम स्वयं अपने धर्म, संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों का पालन करेंगे, तभी हमारी आने वाली पीढ़ी भी उन संस्कारों को अपनाएगी। बच्चे अपने माता-पिता और परिवार को देखकर सीखते हैं, इसलिए हमें अपने जीवन में सदाचार, भक्ति, सम्मान और अनुशासन को स्थान देना चाहिए। यदि घर में भगवान का स्मरण, पूजा-पाठ, बड़ों का सम्मान और सनातन परंपराओं का पालन होगा, तो बच्चे भी स्वाभाविक रूप से उन्हीं मूल्यों को ग्रहण करेंगे। लेकिन यदि हम स्वयं अपने संस्कारों की उपेक्षा करेंगे, तो बच्चों से उनके पालन की अपेक्षा करना व्यर्थ है।