प्रेम और सामंजस्य से ही संवरते हैं रिश्तेः मुनि श्री आगम सागर जी महाराज
रायपुर। "क्रोध पतन का मूल कारण, उत्तम क्षमा धर्म के पावन अवसर पर पूज्य मुनि श्री आगम सागर जी महाराज ने अपनी मंगल देशना में मानव मन की चंचलता और क्रोध से होने वाले गंभीर दुष्परिणामों पर अत्यंत व्यावहारिक एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान किया। महाराज श्री ने कहा कि जब परिस्थितियां व्यक्ति के अनुकूल नहीं होतीं या उसके मन की बात पूरी नहीं होती, तब उसके भीतर क्रोध का जन्म होता है। विचारणीय विषय यह है कि गुस्सा कभी किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। गुस्से से कोई काम बनता नहीं, बल्कि बना-बनाया काम भी पूरी तरह बिगड़ जाता है।
मुनि श्री ने क्रोध के गंभीर प्रभावों को विस्तार से समझाते हुए कहा कि जब व्यक्ति गुस्सा करता है, तो उसके देखने और सोचने के भाव पूरी तरह बदल जाते हैं। क्रोध का प्रभाव केवल विचारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरे वातावरण को नकारात्मक बना देता है।
उन्होंने वात्सल्यपूर्ण दृष्टांत देते हुए बताया कि यदि एक मां अत्यधिक गुस्से की स्थिति में अपने बच्चे को दूध पिलाती है, तो वह दूध भी विष के समान हानिकारक हो जाता है। क्रोध से जीवन में कभी ऊंचाई और प्रगति हासिल नहीं होती, बल्कि व्यक्ति का पतन होता है। जिस व्यक्ति पर हम गुस्सा करते हैं, उससे अनजाने में ही दुश्मनी पैदा हो जाती है और यह दुश्मनी केवल इसी जन्म तक सीमित न रहकर जन्म-जन्मांतर का बैर बन जाती है।
पारिवारिक जीवन में सामंजस्य और दृष्टिकोण में बदलाव आज के समय में हर व्यक्ति यह उम्मीद रखता है कि पूरी दुनिया और घर के सभी सदस्य उसके हिसाब से चलें। मुनि श्री ने इस सोच को बदलने का आह्वान करते हुए कहा कि जब बच्चे बड़े हो जाएं और पिता के जूते बच्चे के पैर में आने लगें, तो उन पर गुस्सा करने या दबाव बनाने के बजाय उनके साथ मित्रवत व्यवहार करना चाहिए।
उन्होंने सवाल किया कि हम कब तक केवल अपनी मनमानी करेंगे? परिवार और समाज में प्रेम भाव तभी बना रह सकता है जब संतुलन हो। यदि आप अपनी चार बातें दूसरों से मनवाते हैं, तो आपका भी यह कर्तव्य बनता है कि आप दूसरों की बातें भी सुनें और मानें। जो व्यक्ति केवल अपनी मनमानी पर अड़ा रहता है, वह एक दिन अपनों के बीच भी अकेला पड़ जाता है। उन्होंने आगे कहा कि आज हमारी सबसे बड़ी भूल यह है कि हम केवल दूसरों को सुधरते देखना चाहते हैं, स्वयं में बदलाव नहीं करना चाहते। जबकि जीवन का सच्चा नियम यही है कि "हम सुधरेंगे, तो जग सुधरेगा।" दुश्मनी समाप्त कर प्रेम बढ़ाने के छः व्यावहारिक सूत्र में महाराज श्री ने आपसी कड़वाहट को खत्म करने और संबंधों में आत्मीयता घोलने के लिए छः सरल एवं प्रभावी बातें बताईं: पहला - दूसरों के पास जाना और उन्हें अपने पास बुलाना,दूसरा - दूसरों की बातें सुनना और अपनी बात उन्हें सुनाना,तीसरा - दूसरों के साथ खाना और उन्हें आदरपूर्वक खिलाना
उन्होंने कहा कि जब लोग आपस में मिलना-जुलना, संवाद करना और साथ बैठकर भोजन करना शुरू करते हैं, तो बड़े से बड़ा बैर भाव भी समाप्त हो जाता है। प्रवचन के समापन पर मुनि श्री ने सभी श्रद्धालुओं को अपने भीतर के क्रोध को त्यागकर संयम, क्षमा और प्रेम के साथ जीवन जीने का संकल्प दिलाया।
दशलक्षण पर्व के प्रथम दिन मंदिर जी में दिनभर धर्म और भक्ति का आलौकिक वातावरण बना रहा। पर्यूषण पर्व की अवधि में प्रतिदिन प्रातः 5.30 बजे से रात्रि 8.30 बजे तक विभिन्न धार्मिक, अध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
समयोपदेश वर्षायोग 2026 समिति एवं सकल दिगम्बर जैन समाज ने समस्त धर्मानुरागी बंधुओं से निवेदन किया है कि वे अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर मुनि श्री के प्रवचनों का श्रवण करें एवं जिन-भक्ति कर धर्म लाभ अर्जित करें।