राजभाषा विभाग द्वारा जोनल रेलवे, बिलासपुर में “प्रशिक्षकों के लिए प्रशिक्षण” संगोष्ठी संपन्न
रायपुर। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे, बिलासपुर में 4 अप्रैल को प्रधान कार्यालय, राजभाषा विभाग द्वारा "प्रशिक्षकों के लिए प्रशिक्षण" विषय के अंतर्गत संगोष्ठी आयोजित की गई । इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रुप में बिलासपुर नगर की संस्कृत साहित्य की विदुषी महामहोपाध्यायाचार्या डॉ. पुष्पा दीक्षित तथा मुख्य अतिथि के रूप में अपर महाप्रबंधक, द.पू.म.रेलवे, बिलासपुर विजय कुमार साहू उपस्थित रहे।
सर्वप्रथम अपर महाप्रबंधक, विजय कुमार साहू द्वारा विशिष्ट अतिथि डॉ. पुष्पा दीक्षित एवं प्रोफेसर शिवप्रसाद दीक्षित जी का तथा मुख्य राजभाषा अधिकारी एवं मुख्य सामग्री प्रबंधक -I, शिवशंकर लकड़ा द्वारा अपर महाप्रबंधक का स्वागत किया गया। इसके पश्चात अपर महाप्रबंधक ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि डॉ. पुष्पा दीक्षित बिलासपुर नगर की ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारतवर्ष की गौरव हैं । वे संस्कृत भाषा और साहित्य की विदुषी होने के साथ ही इस प्राचीन और पवित्र भाषा के संरक्षण और संवर्द्धन के प्रति समर्पित हैं । उन्होंने डॉ. दीक्षित द्वारा किए गए पाणिनीय व्याकरण शास्त्र एवं अन्य विषयों पर शोध कार्य की प्रशंसा करते हुए कहा कि ये शोध कार्य न केवल हमारी सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने में सहायक हैं, बल्कि नई पीढ़ी को भी संस्कृत भाषा के प्रति जागरूक और प्रेरित करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं । उन्होंने आगे कहा कि हमारे देश की प्राय: सभी आधनिुक भाषाएँ संस्कृत से जुड़ी हैं । हिन्दी, मराठी, गुजराती, बंगला,उड़िया, असमिया, पंजाबी, सिन्धी आदि भाषाएँ भी इससे विकसित हुई हैं । दक्षिण भारत की तमिल, तेलगु, कन्नड़ तथा मलयालम में भी संस्कृत के बहुत से शब्द मिलते हैं । संस्कृत भाषा ने राष्ट्र की एकता के लिए बहुत बड़ा कार्य किया है । यही कारण है कि पृथक भाषा परिवारों से होने के बावजूद भी सभी भाषाओं का संस्कृत के साथ परस्पर सामंजस्य है ।
इस अवसर पर डॉ. पुष्पा दीक्षित ने अपने संबोधन में कहा कि संपूर्ण विश्व में वेदादिशास्त्र और विराट संस्कृत वाङ्मय से ही भारत की पहचान है । इन सभी ग्रंथों को संस्कृत भाषा के ज्ञान के बिना नहीं जाना जा सकता है और संस्कृत को पाणिनीय व्याकरण के बिना नहीं जाना जा सकता है । उन्होंने महामना चाणक्य का श्लोक - "शास्त्राणामपरिरक्षणेन राष्ट्रमपरिरक्षितं भवति।" को उद्धृत करते हुए कहा कि शास्त्रों की रक्षा करके ही राष्ट्र की रक्षा की जा सकती है । डॉ. दीक्षित ने राजभाषा हिंदी की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हिंदी की उपेक्षा करने से राष्ट्र की उपेक्षा होती है । वर्तमान में अंग्रेजी शिक्षा के व्यापक प्रभाव के कारण भारत की मूल संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति हावी हो रही है और संस्कृत और हिंदी भाषा की उपेक्षा के परिणाम स्वरूप सभी पुराने उच्चादर्श, परंपरा, मानवीय मूल्य और नैतिकता कमजोर पडती जा रही है । उन्होंने कहा कि यदि आधुनिक विषयों को पाणिनीय महाशास्त्र की वैज्ञानिकता से जोड़कर पढ़ाया जाये तो राष्ट्र में अत्यन्त मेधावी पीढ़ी उत्पन्न की जा सकती है, जो आज लुप्तप्राय हो रही है ।