महाराष्ट्र मंडल में मंचित मराठी नाटक ‘सेलिब्रशन’ को देखने के लिए बड़ी संख्या में जुटे रंगप्रेमी दर्शक
2026-11-05 02:50 PM
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रायपुर। ‘हर किसी को लगता है कि परिवार का दूसरा सदस्य उसे समझता नहीं, उससे प्यार नहीं करता, अब उसकी कोई कद्र नहीं बची है! हम अपने मन में गुस्से के ऐसे भरे हुए गटर लेकर जी रहे हैं... और मरने से पहले ही एक अनचाही दुर्गंध फैला रहे हैं! अखिलेश, आप आप सच ही कहते हैं कि इस दौर ने एक-दूसरे को सहन करने की ताकत ही खत्म कर दी है। सिर्फ पति-पत्नी ही नहीं, बल्कि भाई-बहन भी एक-दूसरे से दूर फेंके जा रहे हैं! तलाक सिर्फ पति-पत्नी के बीच ही नहीं, बल्कि भाई-बहन, पिता-पुत्र, मां-बेटे और दोस्तों के बीच भी हो रहे हैं। डबडबाई आंखों से 70 वर्षीय मालती बाई सबनीस का यह संवाद दर्शकों को भीतर तक हिलाकर रख देता है और उसे यह अपने ही घर की कहानी लगने लगती है।
यह भावनात्मक दृश्य महाराष्ट्र मंडल के संत ज्ञानेश्वर सभागृह में मंचित मराठी नाटक ‘सेलिब्रेशन’ का है। जिसे देखते हुए बहुतायत रंगप्रेमियों की आंखें नम हो गईं। प्रशांत दलवी लिखित और प्रसन्न निमोणकर निर्देशित महाराष्ट्र के सुपरहिट दो नाटक ‘सेलिब्रेशन’ का मंचन बुधवार शाम को कुमुदिनी वरवंडकर रंगमंच पर किया गया। दिव्यांग बालिका विकास गृह सहायतार्थ इस नाटक को देखने के लिए पहुंचे सैकड़ों दर्शकों से संत ज्ञानेश्वर सभागृह खचाखच रहा। साथ ही रंग प्रेमियों ने ‘सेलिब्रेशन’ के हर सीन को भीतर से महसूस किया।
अनिल श्रीराम कालेले के मार्गदर्शन में प्रसन्न निमोणकर निर्देशित ‘सेलिब्रेशन’ में प्रांजल बक्षी और अथर्व महावादी आज की सोच का भली भांति प्रतिनिधित्व करते हैं। अर्चन (प्रांजल) का संवाद ‘हमारे फील्ड के तो कितने ही लोग पति-पत्नी की तरह ऐसे ही रहते हैं। मेरी एक फ्रेंड तो कहती है कि 'लाइफ पार्टनर' का यह कॉन्सेप्ट ही कल आउटडेटेड हो जाएगा! अपना पार्टनर हमसे जिंदगी भर ठीक से बर्ताव करेगा, ऐसा भरोसा ही अब किसी को नहीं बचा है।‘ वहीं अपूर्व (अथर्व) का डायलाग ‘व्हॉटस् रांग इन इट? गलत फैसला लेकर लाइफ मिजरेबल करने से बेहतर है कि पहले ही यह देख लिया जाए कि हमारी एक-दूसरे से जम रही है या नहीं।
टूटते - बिखरते रिश्तों को बचाने, एकजुट करने की जद्दोजहद में बेहद संयमित अभिनय के साथ प्रिया बक्षी पूरे नाटक में छाईं रहीं। प्रसन्न निमोणकर पहले भाग में प्रभावित करते हैं, तो बाकी के हिस्से में उनकी मौजूदगी व्हील चेयर पर बिठाए गए शव की रही। घर से भागी हुई तेजतर्रार बेटी की भूमिका में कुंतल कालेले ने ध्यान खींचा। बेटों पवन ओगले, सुधांशु नाफडे़ और गणेशा जाधव पाटील, बहुओं के रोल में गौरी क्षीरसागर व कीर्ति हिशीकर, दामाद रविंद्र ठेंगड़ी ने बेहतर काम किया हैं। नाटक का प्रबल पक्ष परितोष डोनगांवकर का पार्श्व संगीत व प्रवीण क्षीरसागर का प्रकाश संयोजन व प्रभावी सेट रहा। रंगभूषा में वंदना निमोणकर, वर्तिका क्षीरसागर, वेशभूषा में अपर्णा कालेले रहीं। नेपथ्य में नवीन देशमुख, अजय पोतदार और प्रकाश गुरव सक्रिय रहे।
प्रमुख संवाद
0- कहते हैं कि समय बहुत कठिन आ गया है! तो फिर क्यों न हम खुद ही थोड़े सरल हो जाएं? अगर समय बुरा है, तो क्यों न हम खुद ही थोड़े और अच्छे बन जाएं? अच्छा बर्ताव करना... क्या सचमुच इतना मुश्किल है…. इतना असंभव है
0- हां... अब हम लोग संबंधों को टिकाये रखना संभवतः उतना महत्वपूर्ण नहीं मानते, जितना कि अपनी आर्थिक व्यवस्था और आध्यात्म को।
0- हमने तलाक को एक सुविधा के रूप में स्वीकार तो कर लिया है, लेकिन इसमें सामंजस्य कहां है? आज भी हर भारतीय महिला या पुरुष तलाक लेते समय अपने दिल में भारी अपराधबोध महसूस करता है। यही कारण है कि वे दूसरों को बदनाम करके यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि उनका पक्ष सही है।
0- हमारे बच्चों के बच्चों के लिए तो कल ननिहाल भी नहीं बचेगा। 'ननिहाल' का यह कॉन्सेप्ट ही पूरी तरह खत्म हो जाएगा!