काशी में गौरा के गौने की हल्दी का मंगल उत्सव
2026-02-22 03:39 PM
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वाराणसी| महाशिवरात्रि के बाद देवाधिदेव की नगरी काशी में शिव-विवाह की रस्मों का अगला अध्याय प्रारंभ हो रहा है। रंगभरी एकादशी से पूर्व माता गौरा के गौने की परंपरागत हल्दी चढ़ाने की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। 24 फरवरी, मंगलवार को सायंकाल 7 बजे टेढ़ीनीम स्थित पूर्व महंत आवास पर माता गौरा की चल प्रतिमा को विधिविधानपूर्वक हल्दी अर्पित की जाएगी। यह रस्म केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि काशीवासियों की सामूहिक आस्था और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक है।
नौ गौरी–नौ दुर्गा के मंत्रों से अभिमंत्रित हल्दी
दुर्गा मंदिर के महंत कौशल द्विवेदी ने बताया कि इस वर्ष भी गौने की हल्दी काशी के प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर से विशेष पूजन के उपरांत लाई जाएगी। 27 फरवरी को पड़ने वाली रंगभरी एकादशी से पूर्व 24 फरवरी को मंदिर में नौ देवी और नौ गौरियों के आव्हान मंत्रों के साथ हल्दी को अभिमंत्रित किया जाएगा। इसके बाद पूर्व महंत परिवार शोभायात्रा स्वरूप इसे टेढ़ीनीम स्थित पूर्व महंत आवास तक लेकर पहुंचेगा। यह परंपरा धार्मिक विधान से आगे बढ़कर काशी की सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है।
टेढ़ीनीम महंत आवास में भव्य अनुष्ठान
काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत परिवार के प्रतिनिधि पं. वाचस्पति तिवारी ने बताया कि टेढ़ीनीम स्थित पूर्व महंत आवास में गौरा के गौने की रस्में सदियों से संपन्न होती आ रही हैं। 24 फरवरी को हल्दी चढ़ाने से पूर्व माता गौरा का 11 वैदिक ब्राह्मणों द्वारा विशेष पूजन होगा। वेद मंत्रों की गूंज, शंखध्वनि और घंटानाद के बीच गौरा की चल प्रतिमा मंडप में विराजमान होगी। पूजन उपरांत परंपरागत रीति से हल्दी अर्पित की जाएगी और फिर माता गौरा का भव्य श्रृंगार किया जाएगा। वस्त्र, आभूषण और पुष्पों से सुसज्जित स्वरूप श्रद्धालुओं के लिए दिव्य दर्शन का अवसर बनेगा।
लोकगीतों से गुंजायमान होगा वातावरण
गौने की हल्दी केवल वैदिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोकजीवन का उत्सव भी है। जैसे ही रस्म आरंभ होगी, महंत आवास में मंगलगीतों और सोहर की गूंज सुनाई देगी। काशी की महिलाएं पारंपरिक गीतों के माध्यम से इस अवसर को भावपूर्ण बनाती हैं। लोकमान्यता है कि बाबा और गौरा केवल आराध्य देव नहीं, बल्कि काशी के परिवार के सदस्य हैं। यही कारण है कि इस रस्म में पूरे नगर की आत्मीय सहभागिता रहती है।
रंगभरी एकादशी तक चलेगा मांगलिक क्रम
गौने की हल्दी से प्रारंभ हुआ यह मांगलिक क्रम रंगभरी एकादशी तक चलता रहेगा। इस दिन बाबा विश्वनाथ माता गौरा को ससुराल से विदा कर अपने धाम लाते हैं। अबीर-गुलाल और पुष्पवर्षा से संपूर्ण काशी रंग और भक्ति में डूब जाती है। पूर्व महंत परिवार ने बताया कि इस वर्ष भी श्रद्धालुओं की सुविधा और परंपरा की गरिमा बनाए रखने के लिए विशेष प्रबंध किए जा रहे हैं।
काशी की सांस्कृतिक आत्मा का उत्सव
गौरा के गौने की हल्दी काशी की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है। यहां वेद और लोक एक-दूसरे के पूरक हैं। जहां ब्राह्मणों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार होता है, वहीं लोकगीतों की मधुर ध्वनि वातावरण को भावविभोर कर देती है। यह आयोजन केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण है।
24 फरवरी की संध्या जब दुर्गा मंदिर से पूजित हल्दी टेढ़ीनीम पहुंचेगी और माता गौरा के अंग-अंग पर अर्पित होगी, तब काशी एक बार फिर अपनी आध्यात्मिक विरासत का साक्ष्य प्रस्तुत करेगी। रंगभरी एकादशी तक चलने वाला यह मंगलमय क्रम श्रद्धालुओं को भक्ति, उल्लास और लोकसंस्कृति के रंगों से सराबोर कर देगा।