रीढ़ का ऑपरेशन होना था, पैर काट दिया सिस्टम ने: बीएचयू की लापरवाही ने ली बुजुर्ग महिला मरीज की जान
2026-04-16 08:10 AM
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पहचान की चूक ने ली जान
वाराणसी वाराणसी के काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ट्रॉमा सेंटर से जो खबर सामने आई है, वह सिर्फ एक अस्पताल की गलती नहीं बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर सवाल खड़ा करती है। इलाज के नाम पर भरोसा लेकर अस्पताल पहुंची एक बुजुर्ग महिला को ऐसी लापरवाही का शिकार होना पड़ा, जिसकी कीमत उसे अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। 71 वर्षीय महिला मरीज का रीढ़ की हड्डी के ट्यूमर का ऑपरेशन होना था, लेकिन पहचान में हुई चूक के कारण उसका पैर का ऑपरेशन कर दिया गया। यह घटना चिकित्सा व्यवस्था में व्याप्त गंभीर खामियों को उजागर करती है।
एक नाम, दो मरीज और घातक भ्रम
मामले की जड़ में है एक साधारण लेकिन घातक गलती—नाम का भ्रम। जानकारी के मुताबिक, राधिका नाम की दो महिला मरीज अलग-अलग विभागों, न्यूरोसर्जरी और ऑर्थोपेडिक्स में भर्ती थीं। 7 मार्च 2026 को न्यूरोसर्जरी विभाग में भर्ती उस बुजुर्ग महिला को, जिनकी रीढ़ की सर्जरी होनी थी, गलती से ऑर्थोपेडिक्स के ऑपरेशन थिएटर में पहुंचा दिया गया। यह चूक सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता को दर्शाती है, जहां पहचान की पुष्टि जैसे बुनियादी नियमों की अनदेखी की गई।
ऑपरेशन थिएटर में खुली पोल
सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि बिना मरीज की सही पहचान और मेडिकल जांच की पुष्टि किए, ऑर्थोपेडिक टीम ने ऑपरेशन शुरू भी कर दिया। ऑपरेशन के दौरान जब डॉक्टरों को अपेक्षित समस्या नहीं मिली, तब जाकर उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। इसके बाद मरीज को तुरंत न्यूरोसर्जरी वार्ड में शिफ्ट किया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इतनी बड़ी चूक कैसे और किन हालात में संभव हुई।
गलत सर्जरी के बाद बिगड़ती हालत
गलत ऑपरेशन का असर धीरे-धीरे सामने आने लगा। मरीज की हालत लगातार खराब होती गई। उसे दौरे पड़ने लगे, जबड़े में जकड़न, मुंह में अल्सर और सांस लेने में तकलीफ जैसी गंभीर समस्याएं सामने आईं। करीब 20 दिन तक जिंदगी और मौत के बीच जूझने के बाद 27 मार्च 2026 को उसे गंभीर सांस की समस्या हुई और कार्डियोपल्मोनरी अरेस्ट के बाद उसकी मौत हो गई। परिजनों ने अस्पताल प्रशासन पर लापरवाही, दुर्व्यवहार और इलाज में देरी जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं।
जांच में भी गड़बड़ी, सवालों के घेरे में सिस्टम
घटना के बाद चिकित्सा विज्ञान संस्थान ने जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी बनाई, लेकिन यहां भी लापरवाही सामने आई। पहली जांच कमेटी में उसी विभाग के एक डॉक्टर को शामिल कर लिया गया, जो ऑपरेशन के समय मौजूद थे। इससे जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो गए। बाद में इस कमेटी को भंग कर नई कमेटी गठित की गई, जिसकी जिम्मेदारी प्रो. अजीत सिंह को सौंपी गई है। अब यह कमेटी पूरे मामले की जांच कर रिपोर्ट देगी।
जिम्मेदारों के बयान और कार्रवाई का इंतजार
अस्पताल प्रशासन ने मामले को गंभीर बताया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ बयान और जांच से न्याय मिल पाएगा। कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि मामले को संज्ञान में लिया गया है और नई जांच कमेटी बनाई गई है, जो सभी पहलुओं की जांच कर रिपोर्ट देगी। वहीं, संस्थान के निदेशक प्रो. एस.एन. संखवार ने भी इसे गंभीर मामला बताते हुए कहा कि जांच के बाद दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
लापरवाही नहीं, जवाबदेही का संकट
यह घटना सिर्फ एक मेडिकल मिस्टेक नहीं, बल्कि जवाबदेही के अभाव की भयावह तस्वीर है। सवाल यह नहीं है कि गलती कहां हुई, बल्कि यह है कि इतनी बड़ी चूक को रोकने के लिए जो सिस्टम होना चाहिए था, वह कहां था। जब अस्पतालों में पहचान की पुष्टि जैसे बुनियादी नियमों का पालन नहीं होगा, तो मरीजों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी? यह मामला चेतावनी है कि अगर अब भी व्यवस्था नहीं सुधरी, तो ऐसी घटनाएं दोहराई जाती रहेंगी और निर्दोष मरीज इसकी कीमत चुकाते रहेंगे।