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दोनों किडनियां खराब हुईं तो पति बना जीवनदाता, अपनी किडनी देकर पत्नी को दी नई जिंदगी…

नई दिल्ली:- दिल्ली-एनसीआर गंभीर बीमारी के चलते जब 28 वर्षीय महिला की दोनों किडनियां खराब हो गईं और किडनी ट्रांसप्लांट भी कई जटिलताओं से घिरा नजर आया, तब उसके पति ने आगे बढ़कर अपनी किडनी दान करने का फैसला लिया। यशोदा मेडिसिटी अस्पताल की मेडिकल टीम ने APLA Syndrome, किडनी फेल्योर और डोनर-स्पेसिफिक एंटीबॉडीज जैसी चुनौतियों के बीच इस हाई-रिस्क किडनी ट्रांसप्लांट को सफलतापूर्वक पूरा किया। 18 अगस्त 2026 को हुए इस ट्रांसप्लांट के बाद मरीज की हालत में तेजी से सुधार हुआ और नई किडनी ने सर्जरी के तुरंत बाद काम करना शुरू कर दिया।

जानकारी के मुताबिक 28 वर्षीय मोरीफत राशिद करीब डेढ़ साल पहले ल्यूपस यानी SLE से जुड़ी APLA Syndrome नामक गंभीर ऑटोइम्यून बीमारी की चपेट में आई थीं। इस बीमारी में शरीर के अंदर खून के थक्के बनने का खतरा बढ़ जाता है। धीरे-धीरे बीमारी का असर उनकी किडनियों पर पड़ा और उनकी दोनों किडनियां खराब हो गईं। इसके बाद उनके सामने किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत पैदा हुई, लेकिन मामला सामान्य ट्रांसप्लांट की तुलना में काफी ज्यादा चुनौतीपूर्ण था।

मरीज के मेडिकल इतिहास ने डॉक्टरों के सामने जोखिम और बढ़ा दिया था। तीन बार गर्भपात और कई बार ब्लड ट्रांसफ्यूजन होने के कारण उनके शरीर में डोनर-स्पेसिफिक एंटीबॉडीज यानी DSA मौजूद थीं। ऐसी स्थिति में ट्रांसप्लांट की गई किडनी को शरीर द्वारा रिजेक्ट किए जाने का खतरा बढ़ जाता है। इसके साथ ही APLA Syndrome के कारण नई किडनी की रक्त वाहिकाओं में खून का थक्का बनने की आशंका भी बनी हुई थी। डॉक्टरों को एक तरफ शरीर द्वारा नई किडनी को अस्वीकार किए जाने से बचाना था, तो दूसरी तरफ किडनी में ब्लड फ्लो को बनाए रखना भी बड़ी चुनौती थी।

इस जटिल केस को देखते हुए यशोदा मेडिसिटी के विशेषज्ञों ने ट्रांसप्लांट से पहले विस्तृत तैयारी की। मेडिकल टीम में डॉ. वैभव सक्सेना, डॉ. कुलदीप अग्रवाल, डॉ. प्रजीत मजूमदार और डॉ. इंद्रजीत जी. मोमिन सहित विशेषज्ञ शामिल रहे। एंटीबॉडीज के स्तर को कम करने के लिए ट्रांसप्लांट से पहले प्लाज्माफेरेसिस के तीन सेशन किए गए और IVIg थेरेपी दी गई। वहीं खून के थक्के बनने के खतरे को नियंत्रित करने के लिए मरीज की वारफेरिन दवा को सर्जरी से पांच दिन पहले रोककर हेपरिन इंजेक्शन दिया गया।

डॉक्टरों ने सर्जरी के दौरान नई किडनी में रक्त के प्रवाह को बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया। इस तरह के मामलों में थोड़ी सी भी जटिलता ट्रांसप्लांट की गई किडनी के लिए गंभीर समस्या पैदा कर सकती है। मेडिकल टीम की सर्जिकल प्लानिंग और नेफ्रोलॉजी टीम के बीच समन्वय के चलते ट्रांसप्लांट सफल रहा और नई किडनी ने शरीर में प्रत्यारोपित होने के तुरंत बाद यूरिन बनाना शुरू कर दिया।

अस्पताल के सीनियर डायरेक्टर डॉ. वैभव सक्सेना के मुताबिक यह तकनीकी रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण ट्रांसप्लांट था। APLA Syndrome के कारण ब्लड क्लॉट बनने का खतरा था, जबकि शरीर में मौजूद एंटीबॉडीज के चलते नई किडनी के रिजेक्शन की आशंका भी बनी हुई थी। ऐसे में सर्जरी से पहले और बाद की पूरी प्रक्रिया में बेहद सावधानी बरती गई।

डॉ. प्रजीत मजूमदार ने बताया कि हाई-रिस्क ट्रांसप्लांट में सटीक प्लानिंग और समय पर सही थेरेपी बेहद महत्वपूर्ण होती है। इस मामले में मरीज को ट्रांसप्लांट से पहले जरूरी उपचार दिया गया और सर्जरी के बाद भी लगातार निगरानी रखी गई, जिसके चलते नई किडनी ने बेहतर तरीके से काम करना शुरू किया।

इस पूरे मामले में मरीज के पति का फैसला भी बेहद महत्वपूर्ण रहा। पत्नी की गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्होंने अपनी एक किडनी दान करने का निर्णय लिया। मरीज मोरीफत राशिद ने अपने पति के इस फैसले को अपने जीवन के सबसे मुश्किल दौर में बड़ी ताकत बताया। उन्होंने डॉक्टरों और पूरी मेडिकल टीम का भी आभार जताया।

ट्रांसप्लांट के बाद मरीज की रिकवरी भी अच्छी रही। अस्पताल से छुट्टी के समय उनका सीरम क्रिएटिनिन लेवल 0.7 mg/dL था। बाद की जांच में यह 0.9 mg/dL रहा, जिसे डॉक्टरों ने स्थिर बताया। मरीज अब घर पर स्वास्थ्य लाभ ले रही हैं और जरूरी दवाओं के साथ धीरे-धीरे सामान्य दिनचर्या की ओर लौट रही हैं।
 

यह मामला दिखाता है कि गंभीर ऑटोइम्यून बीमारी, ब्लड क्लॉटिंग के खतरे और एंटीबॉडी जैसी जटिलताओं वाले मरीजों में किडनी ट्रांसप्लांट के लिए विस्तृत जांच, विशेषज्ञों की टीम और सावधानीपूर्वक उपचार योजना की जरूरत होती है। इस सफल ट्रांसप्लांट के बाद मरीज और उनके परिवार के लिए एक नई उम्मीद पैदा हुई है। 

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