जिंदगी एक पेंसिल है, शार्पनर जरूरी हैः आचार्य श्री जिनमणिप्रभ सूरीश्वरजी म.सा.
रायपुर। पेंसिल लिखने के लिए बनीं है, लेकिन बाजार से नई पेंसिल लगाने के बाद सीधे लिखने योग्य नहीं होती। उसे छिलना पड़ता है, शार्प करना पड़ता है, शार्पनर, पेंसिल का शत्रु नहीं बल्कि उलका मित्र है। वह से नष्ट नहीं करता, बल्कि उसे उसकी वास्तविक उपयोगिता हेतु बनाता है। इसी प्रकार हमारे जीवन में भी गुरु शार्पनर की भूमिका निभाते है। गुरू कभी रोकते है,कभी टोकते है और आगे बढ़ने की प्रेरणा देते है। उक्ताशय के विचार परम पूज्य गुरूदेव खरतरगच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसुरीश्वर म.सा. ने त्रयनगर हैदराबाद स्थित श्री जिनकुशल दादावाड़ी बाग के प्रांगण में आयोजित चातुर्मास प्रवचन के दौरान कहीं।
पूज्य श्री ने कहा कि जीवन में शार्पनर आवश्यक है, वहां मां हो, पिता हो, गुरू हो या कोई सच्चा हितैषी जो हमें रोक सके, टोक सके, हमारी कमियां बता सके और सही दिशा में आगे बढ़ने में मदद करें। उसकी हर बात हमें अच्छी लगे यह जरूरी नहीं, लेकिन अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए उनकी रोक-टोक को स्वीकार करना हितकर होता है। योग्यता हमारे भीतर पहले से मौजूद है लेकिन उस योग्यता को प्रकट करने के लिए जीवन में सही शार्पनर का होना और उसकी चोट को स्वीकार करना आवश्यक है।
पूज्यश्री ने कहा कि अंधकार से निकलकर जब प्रकाश में हमारा जन्म होता है, तभी जीवन की पहली यात्रा शुरू होती है। उसी क्षण से मन में प्रश्न होना चाहिए कि मुझे क्या करना है, क्या बनना है, क्या करना है और क्या नहीं करना है। जीवन की यह छोटी सी यात्रा है, कब पूरी हो जाए कोई नहीं जानता। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि जीवन को सार्थक कैसे बनाया जाए। गुरु हमारी प्रशंसा कर दे तो हमें काफी अच्छा लगता है, लेकिन अच्छा शिष्य वहीं हैं जिसे गुरु की डांट में भी अपनी हित दिखाई दें। प्रशंसा हमें प्रसन्न करती है, लेकिन सच्ची बात हमें योग्य बनाती है। गुरु की कठोरता हमारे भीतर की प्रतिभा को निखारने का कार्य करती है।
मन की भूमिका पर चिंतन कराते हुए पूज्यश्री ने कहा कि प्रश्न यह है कि हम मन के मालिक हैं या मन हमारा मालिक? आत्मा मालिक है और मन उसका साधन है। लेकिन जब मन ही मालिक बन जाता है तब जीवन आग्रह, दुराग्रह और पूर्वाग्रह से भरने लगता है। हमें अपने मन को कोरे कागज की तरह रखना चाहिए, जो कदाग्रह और पूर्वाग्रह से मुक्त हो। किसी व्यक्ति में अच्छाई के साथ कोई कमी दिखाई दे तो हम उसके बारे में नकारात्मक निष्कर्ष निकाल लेते है। ऐसे करना हमारे मन की कमजोरी है। व्यक्ति को एक गलती से नहीं बल्कि संपूर्ण व्यक्तित्व और उसके सकारात्मक प्रयासों से देखना चाहिए।