हिमाचल में 2352 करोड़ की चिनाब-ब्यास लिंक हाइड्रो प्रोजेक्ट का विरोध, इसे क्यों बताया जा रहा 'वॉटर बॉम्ब'
2026-10-01 09:44 AM
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कुल्लू: हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति में 2352 करोड़ रुपये की प्रस्तावित चिनाब-ब्यास लिंक हाइड्रो परियोजना को लेकर पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में यह परियोजना बाढ़, भूस्खलन, हिमस्खलन और ग्लेशियल झील फटने से आने वाली बाढ़ का खतरा बढ़ा सकती है। नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन की इस परियोजना के तहत करीब 3,140 मीटर की ऊंचाई पर चंद्रा नदी पर कोकसर के पास 19 मीटर ऊंचा कंक्रीट बैराज प्रस्तावित है। इसके अलावा पीर पंजाल रेंज के नीचे से 8.7 किलोमीटर लंबी सुरंग बनाकर पानी को मनाली के पास धुंडी, पलचन या सोलंग के आसपास ऊपरी ब्यास बेसिन में ले जाने की योजना है। इससे आगे बिजली उत्पादन क्षमता को 4,000 मेगावाट तक बढ़ाने का लक्ष्य है।
परियोजना को रोकने की मांग
पर्यावरणविद और हाइड्रोलॉजिस्ट हिमांशु ठक्कर ने परियोजना पर स्वतंत्र जोखिम आकलन होने तक इसे रोकने की मांग की है। उनका कहना है कि हाल के वर्षों में हिमालय में जलवायु से जुड़ी आपदाओं के कारण दोनों नदी बेसिन पहले से अधिक संवेदनशील हो गए हैं। उन्होंने कोकसर में बैराज और सुरंग बनाने की जगह को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। पर्यावरणविद् गुमान सिंह ने परियोजना को ‘वॉटर बॉम्ब’ बताते हुए कहा कि ब्यास घाटी में अतिरिक्त पानी का दबाव बाढ़ के दौरान गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है। उनका तर्क है कि बादल फटने जैसी घटनाएं अब किसी एक मौसम तक सीमित नहीं हैं। ऐसे में नदी में पहले से अतिरिक्त पानी होने पर अचानक आई बाढ़ का असर बेहद गंभीर हो सकता है।
प्रस्तावित सुरंग के आउटफॉल को लेकर भी सवाल उठ रहे
परियोजना की प्रस्तावित सुरंग के आउटफॉल को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। धुंडी, पलचन और सोलंग के आसपास का क्षेत्र पहले ही अचानक बाढ़, भूस्खलन और हिमस्खलन जैसी घटनाओं से प्रभावित रहा है। 2024 में बादल फटने और बाढ़ से पलचन पुल को नुकसान पहुंचा था और लेह-मनाली हाईवे बाधित हुआ था। 2025 के मानसून में भी क्षेत्र को नुकसान हुआ। कारगिल युद्ध के अनुभवी ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर (रिटायर्ड) ने कहा कि ब्यास नदी पिछले कुछ वर्षों में आई बाढ़ से अब तक पूरी तरह उबर नहीं पाई है। उन्होंने सवाल उठाया कि आपदा की स्थिति में बैराज के गेट बंद करने जैसे इमरजेंसी उपाय वास्तव में कितने प्रभावी होंगे।
ब्यास-सतलुज सिस्टम की क्षमता पर भी सवाल उठाया
पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने ब्यास-सतलुज सिस्टम की क्षमता पर भी सवाल उठाया है। उनका कहना है कि पंडोह, पोंग और भाखड़ा जैसे जलाशयों में गाद जमा होने से पानी रोकने की क्षमता प्रभावित हुई है। इसलिए परियोजना का आकलन केवल बैराज और सुरंग तक सीमित न रखकर पूरे नदी बेसिन और निचले क्षेत्रों पर इसके प्रभाव के आधार पर किया जाना चाहिए। ‘सेव लाहौल स्पीति सोसाइटी’ के अध्यक्ष बीएस राणा ने कहा कि परियोजना से जुड़े पर्यावरण, वन और आदिवासी मामलों की मंजूरियों तथा ग्राम सभा के प्रस्तावों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र का आकलन सिर्फ सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर नहीं किया जा सकता।