वृद्धजन दिवस पर विशेष:- वृद्धों की सेवा युवाओं की सर्वोच्च प्राथमिकता हो
2026-10-01 08:32 AM
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-अजय मधुकर काले
वर्तमान समय में वृद्ध होना कई परिवार में… और स्वयं वृद्धों के लिए भी तनाव का कारण बन रहा है। ये विचारणीय है क्योंकि उनके बच्चे नौकरी, व्यवसाय के कारण साथ नहीं है, और जो हैं, उनमें से अधिकतर का तालमेल अपने माता- पिता या सास- ससुर से अच्छा नहीं है। ये अनुभव करके, आसपास बुजुर्गों की स्थिति को देखकर आसानी से समझा जा सकता है। आज के वरिष्ठों ने अपने युवावस्था में जिंदगी संवारने को लेकर बहुत से कार्य किए। जिंदगीभर अपने बच्चों का कॅरियर बनाने में अपना तन-मन-धन समर्पित कर दिया। आज वही बच्चे उन्हें किन परिस्थितियों में रखते हैं, ये विचारणीय तो है ही, युवाओं को जागरूक करने का आधार भी है। युवाओं को यह समझाना जरूरी है कि कुछ वर्षों के बाद ही जब वे भी वृद्धावस्था में आएंगे, तो उनके साथ वही व्यवहार होगा, आज वे अपने माता- पिता या सास- ससुर के साथ कर रहे हैं, क्योंकि यही कुछ उनके अपने बच्चे देख और सीख रहे हैं। एक वरिष्ठ ने तो यहां तक कहा कि वो अपने बच्चे के घर में रहते हैं, पर वैसा नहीं रह पाते हैं जैसे उनके बच्चे उनके घर में रहते थे। ऐसे कम ही बच्चे हैं, जो मानते हैं कि हमारे माता- पिता, सास- ससुर हमारे साथ नहीं रहते, बल्कि हम उनके साथ रहते हैं। ध्यान दीजिए, इन दोनों बयानों में… विचारों में जमीन- आसमान का फर्क स्पष्ट दिखाई देता है।
एक बात यदि युवाओं को समझ में आ जाए या अच्छे से समझा दिया जाए कि आज यदि उनके अभिभावक उन्हें बोझ लग रहे हैं , तो कल उनकी भी बारी है। समय को समय गुजरने के लिए समय नहीं लगता। समय है तो संभाल लें अपने कर्तव्य को क्योंकि गुजरा हुआ समय लौट कर नहीं आता। कुछ वर्षों के बाद भारत में हमें जो अनुभवी पीढ़ी मिलेगी, वो कष्टों, मेहनत के साथ बनी हुई मिलेगी, पर उन्हें बुढ़ापे का कष्ट नहीं झेलना पड़ेगा इसीलिए वो वरिष्ठों का ध्यान टॉप प्राथमिकता पर रखें, तो उनका भी बुढ़ापा सुविधाजनक और आसान होगा।
वृद्धाश्रम केवल उन्हीं लोगों के लिए हो, जिनके बच्चे- दामाद नहीं है। ये मापदंड वृद्धाश्रम में प्रवेश पर स्पष्ट हों। तभी बच्चे अपने अभिभावकों व सास- ससुर को अपने घर में रखेंगे। समय व्यतीत करने के लिए डे केयर सेंटर सियान गुड़ी जैसे प्रकल्प, दिव्यांग बच्चों के आश्रम/संस्था से जोड़ कर बनाएं जाए, जिससे कि एक- दूसरे की जिंदगी हसीन होती रहे। संस्कृति भी बची रहेगी, संस्कार भी बचे रहेंगे। भारत का भविष्य उज्ज्वल रहेगा।
- लेखक महाराष्ट्र मंडल रायपुर के अध्यक्ष हैं।