गन्ने के साथ आलू की खेती से बढ़ सकती है कमाई, एक खेत से दो फसलों का अवसर
2026-10-23 10:33 AM
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सहरसा: सीमित जमीन से बेहतर आमदनी प्राप्त करने के लिए सहफसली खेती किसानों के लिए उपयोगी विकल्प हो सकती है। इसमें मुख्य फसल के साथ दूसरी उपयुक्त फसल लगाकर खेत के उपलब्ध स्थान और संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल किया जाता है। सहरसा के किसानों के संदर्भ में भी गन्ने के साथ आलू जैसी फसल की संभावना पर विचार किया जा सकता है। हालांकि, गन्ने के साथ हल्दी लगाने से पहले स्थानीय परिस्थितियों और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर उपयुक्तता तय करना जरूरी है।
गन्ना-आलू सहफसली प्रणाली के लिए कृषि अनुसंधान संस्थानों ने तकनीक विकसित की है। बिहार के पूसा स्थित गन्ना अनुसंधान संस्थान की सलाह में भी शरदकालीन गन्ने के साथ आलू लगाने की विधि बताई गई है। वहीं, सहरसा में किसी विशेष नई योजना, चयनित किसानों या प्रदर्शन कार्यक्रम का विवरण उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे जिले में घोषित सरकारी अभियान के बजाय खेती की संभावनाओं और आवश्यक तैयारियों के रूप में समझना चाहिए।
गन्ने की कतारों के बीच मिलता है अवसर
गन्ने की शुरुआती बढ़वार अपेक्षाकृत धीमी होती है। शरदकालीन रोपाई में कतारों के बीच उपलब्ध जगह का उपयोग उपयुक्त दूसरी फसल के लिए किया जा सकता है। सहफसली खेती का उद्देश्य इसी जगह का योजनाबद्ध इस्तेमाल करना है, ताकि मुख्य फसल के साथ अतिरिक्त उपज प्राप्त करने की संभावना बने। पूसा के गन्ना अनुसंधान संस्थान ने गन्ने के साथ आलू की युग्म कतार विधि विकसित की है। संस्थान की जानकारी के अनुसार, इसमें गन्ने की कतारों के बीच आलू की दो कतारें लगाई जाती हैं। हालांकि, किसी किसान को अपने खेत में यह व्यवस्था अपनाने से पहले स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से खेत की बनावट, रोपाई के समय और उपलब्ध साधनों के अनुसार मार्गदर्शन लेना चाहिए।
आलू से बीच की अवधि में आमदनी की संभावना
गन्ने की फसल तैयार होने में समय लगता है। इसके बीच उपयुक्त अवधि की फसल लेने से किसान को मुख्य फसल की बिक्री से पहले भी आय मिलने का अवसर मिल सकता है। कृषि अनुसंधान परिषद की सामग्री में गन्ने के साथ आलू की खेती को बीच की अवधि में आमदनी प्राप्त करने के विकल्प के रूप में बताया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर खेत में मुनाफा निश्चित रूप से दोगुना होगा। अतिरिक्त फसल के लिए बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और कटाई का खर्च भी बढ़ सकता है। वास्तविक लाभ का हिसाब दोनों फसलों की बिक्री से प्राप्त रकम में कुल लागत घटाकर ही निकलेगा। बाजार भाव और उपज में बदलाव से परिणाम भी बदल सकते हैं।
हल्दी के लिए अलग तकनीकी योजना जरूरी
आलू और हल्दी को एक जैसी फसल मानकर गन्ने के बीच नहीं लगाया जाना चाहिए। दोनों का फसल चक्र, रोपाई का समय, पोषण और कटाई की जरूरतें अलग हैं। किसी अन्य क्षेत्र में सफल प्रयोग मिलने का अर्थ यह नहीं है कि वही व्यवस्था सहरसा के प्रत्येक खेत में समान परिणाम देगी। विशेष रूप से यह स्पष्ट करना जरूरी है कि गन्ने के साथ आलू या हल्दी में से कौन-सी फसल चुनी जा रही है। तीनों फसलों को एक साथ लगाने का निष्कर्ष केवल इस विचार के आधार पर नहीं निकाला जा सकता। हल्दी का विकल्प चुनने वाले किसानों को स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र से क्षेत्र के अनुकूल तकनीकी सिफारिश और बाजार की जानकारी प्राप्त करनी चाहिए।
खेत की तैयारी और प्रबंधन पर दें ध्यान
सहफसली खेती में कतारों की दूरी ऐसी होनी चाहिए कि दूसरी फसल के साथ गन्ने की देखभाल भी संभव रहे। निराई, मिट्टी चढ़ाने, सिंचाई और कटाई के दौरान मुख्य फसल को नुकसान न पहुंचे, इसकी योजना शुरुआत में बनानी होगी। भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित गन्ना-आलू तकनीक में भी कतारों का निर्धारित अनुपात और दूरी शामिल है। इससे स्पष्ट होता है कि सहफसली खेती केवल खाली जगह में बीज डाल देने का तरीका नहीं, बल्कि नियोजित फसल व्यवस्था है। खेत के लिए तकनीक चुनते समय अद्यतन स्थानीय सलाह लेना उपयोगी होगा। मिट्टी की जांच, सिंचाई की उपलब्धता और जलनिकासी की स्थिति पर भी ध्यान दें। दोनों फसलों की जरूरतों को समझे बिना उर्वरक की मात्रा तय करना या एक ही प्रबंधन सभी खेतों में लागू करना सही नहीं होगा।