प्रकृति से जुड़ने से मानसिक स्वास्थ्य के अलावा शारीरिक स्वास्थ्य के भी फ़ायदेः डॉ प्रवीण हरिबाउ गोसेकर
रायपुर। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के सभागार में भारतीय ज्ञान परम्परा पर आयोजित छह दिवसीय कार्य़शाला में 100 से अधिक विद्वान और विदुषी शामिल हुए। आज की कार्यशाला में प्रथम सत्र के वक्ता डॉ प्रवीण हरिबाउ गोसेकर ने बताया की प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्परा के उन्नयन में भारतीय शास्त्रों के वक्ता ने बताया की प्रकृति से जुड़ने से हमारे मानसिक स्वास्थ्य के अलावा, हमारे शारीरिक स्वास्थ्य को भी फ़ायदे होते हैं l प्रकृति हमें सांस लेने के लिए शुद्ध हवा, पीने के लिए पानी, और खाने के लिए भोजन देती है l यह हमें ऊर्जा, स्वास्थ्य, और सुख-शांति भी प्रदान करती है l
डॉ प्रफुल्ल मधुकर तावतकर ने बताया की पंचतंत्र की शिक्षा पद्धति, बच्चों और बड़ों को नैतिकता, बुद्धिमत्ता, और व्यवहारिकता सिखाती हैl यह कहानियां सोचने के लिए प्रेरित करती हैं और जीवन में महत्वपूर्ण गुणों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं l पंचतंत्र की कहानियों से नेतृत्व, सामरिक योग्यता, मित्रता, सत्यनिष्ठा, और बुद्धिमानी जैसे गुणों का ज्ञान मिलता है l वानर और मगरमच्छ की कथाओं के ज़रिए यह बताया गया है कि बुद्धिमान अपने बुद्धिबल से जीत जाता है और मूर्ख हाथ में आई हुई वस्तु से भी वंचित रह जाता है l पंचतंत्र की कहानियां हमें सोचने पर मजबूर करती हैं और अपने जीवन में उन गुणों को अपनाने के लिए प्रेरित करती हैं l पंचतंत्र के पाँच तंत्र हैं: मित्रभेद, मित्रलाभ, काकोलुकीय, लब्धप्रणाश, और अपरीक्षित कारक l ये तंत्र नैतिकता, बुद्धिमत्ता और व्यवहारिकता सिखाते हैं, और जीवन में महत्वपूर्ण शिक्षाएँ प्रदान करते हैं l
तृतीय वक्ता के रूप में डॉ आकाश गेडाम ने वस्तुकला को केस स्टडी के माध्यम से प्रतिभागियों को दुधाधारी मठ ले जाकर अध्ययन कराया एवं बताया की दूधाधारी मठ छत्तीसगढ़ रायपुर के प्रसिद्ध हिंदू धार्मिक स्थलों में से एक है। इस मठ की स्थापना 1554 में हुई थी। राजा रघुराव भोसले ने महंत बलभद्र दासजी के लिए मठ का निर्माण कराया था। दूधाधारी मठ लगभग साढ़े पांच सौ वर्ष पुराना है। यहां पहले घनघोर जंगल हुआ करता था। जंगल में स्वामी बलभद्र दास जी महाराज कुटी बनाकर आश्रम में तपस्या कर रहे थे। तपस्या करते-करते इस स्थान को विकसित किया। बता दें कि मठ के महंत बलभद्र दास हनुमानजी के परम भक्त थे। स्वामी बलभद्र दास के बारे में यह भी कहा जाता है कि उन्होंने जीवन भर दूध का आहार लिया था। दूध का आहार लेने के कारण इस स्थान का नाम दूधाहारी पड़ा, फिर दूधाहारी बोलचाल की भाषा में दूधाधारी हो गया।
उन्होंने आगे बताया की वैष्णव संप्रदाय से संबंधित इस मंदिर में रामायण कालीन दृश्यों का शिल्पांकन आकर्षक तरीके से किया गया है। मंदिर में मराठाकालीन पेंटिंग आज भी मौजूद हैं। पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार मठ के भवन का वास्तु-शास्त्र उड़ीसा शैली से प्रभावित है तथा यहां का अलंकरण मराठा शैली के समान है। प्रत्येक वक्ताओं के साथ प्रतिभागियों का बहुत अच्छा चर्चा महत्वपूर्ण बिंदुओं पर हुआ तथा प्रत्येक प्रश्न का उत्तर वक्ताओं द्वारा दिया गया l वंही समस्त प्रतिभागियों में ज्ञान प्राप्ति के लिए उत्साह अभूतपूर्व रहा एवं सभी ने इस बहुमूल्य ज्ञान को सराहा l पाठ्यक्रम संयोजक प्रोफेसर आर. के. ब्रम्हे, मालवीय मिशन टीचर टेनिंग सेंटर के डायरेक्टर प्रीति के. सुरेश, प्रोफेसर जी. के. देशमुख, डा. बृजेन्द्र पांडेय, डा. अरविंद अग्रवाल समेत बड़ी संख्या में प्राध्यापकगण उपस्थित रहे l