रायपुर

भाव-भंगिमा, गीत और संवाद का अद्भुत समागम देख अभिभूत हुए दर्शक

रंगमंच... अभिनय, संगीत, नृत्य के माध्याम से कहानी और विचारों को जन-जन तक पहुंचाती है। रंगमंच का महत्व जितना मनोरंजन के लिए उतना ही समाज, संस्कृति और मनुष्य के अनुभवों को उजागर करने का सशक्त माध्यम भी है। इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर 3 मार्च की शाम वृंदावन सभागार में आचार्य रंजन मोड़क के निर्देशन में महाराष्ट्र मंडल और रंगभूमि के कलाकारों ने कार्यक्रम अनुभूति के माध्यम से विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर अपना संदेश दर्शकों तक पहुंचाने का प्रयास किया।

गर्मी ने अपनी दस्तक दे दी है, इसके साथ ही हमें पेड़ों की महत्ता याद आने लगी है लेकिन हम सिर्फ शिकायतें करते हाथ बांधे बैठे हैं। प्रकृति के इसी दर्द और समाज और प्रकृति के जीवन चक्र को प्रदर्शित करती लोकेश साहू द्वारा मंचित कविता "हरे भरे पेड़ "के संवाद "कि एक पेड़ गिरा एक चिड़िया गईएक चिड़िया की छाया गई "हमें बताती है कि प्रकृति के बिना मानव अस्तित्व असंभव है। यह न केवल हमें शारीरिक संसाधन प्रदान करती हैबल्कि हमें मानसिक शांतिरचनात्मकताऔर जीवन के उद्देश्य को समझने में भी मदद करती है। इसलिये प्रकृति का संरक्षण और सम्मान करना हमारा कर्तव्य हैताकि आने वाली पीढ़ियां भी इसका लाभ उठा सकें।

यमन साहू ने अपनी कविता तीन मीटर के माध्यम से समाज के पिछड़े इलाकों के साहूकारों को बहरूपिया और सैकड़ों जोड़ी जूते पहने दो पैर का जानवर बताते हुए किसान एवं गरीब वर्ग का दर्द बयां किया। वे कहते हैं कि ये जानवर यानी साहूकार "झोपड़ी बनाने के लिए क़र्ज़ देकर ब्याज में झोपड़ी ले लेता है ।

आज का समाज पत्नी के होते हुए क्यों एक प्रेयसी की उलझन मोल ले लेता और फिर किस प्रकार इस त्रिशंकु के तीनों कोने एक दूसरे के साथ प्रेमसूत्र से नहीं सिर्फ स्वार्थ की बेड़ियों से जकड़ जाते हैं। इन स्वार्थी रिश्तों की सच्चाई बयां करती है सैयद आमीन अली द्वारा मंचित कविता प्रेमिकाएं कि "प्रेमिकाएं सुख की सबसे आखिरी हिस्सेदार होती हैं, दुख की पहले प्रमोशन मिलने पर पुरुष सबसे पहले अपनी पत्नी को कॉल करता है और चेक बाउंस होने पर प्रेमिका को। इस मंचन से दर्शकों को समाज के ऐसे लोगों के बारे में सोचने को मजबूर कर दिया।

रामायण और महाभारत के किरदार हमें जीवन के हर मोड़ पर याद आते हैं। कभी राम सा बन जाने की चाह तो कभी किसी को  कैकई कहकर उसे सही राह दिखाने की मंशा। गांधारी को समाज ने देखा एक पतिव्रता के रूप में तो कैकयी को देखा एक कुमाता की तरह। किंतु इस छवि को उलट-पलट कर देती हैं चंचल ध्रुव एवं अक्षदा मातुरकर द्वारा मंचित कविताएं सुनो गांधारी एवं कैकई के राम। यदि गांधारी ने आंख पर पट्टी न बांधी होती तो वो कौरवों को संस्कारों से पोषित कर पाती। द्रौपदी का चिरहरण न होने देती किंतु वो स्त्रीधर्म निभाने से चूक गई। "अच्छा तो तुम मां थी अच्छा-अच्छा तुम पत्नी भी थीं पर क्या तुम स्त्री नहीं थीं?" जैसे संवाद अंदर तक झंकझोर देते है। यदि कैकई कुमाता नहीं होती तो समाज को राजा राम मिलते पूज्य मर्यादा पुरुषोत्तम राम नहीं। "कैकेयी ही थी जो राम को मर्यादा पुरुषोत्तम राम बना गई!!" ये संवाद त्याग और सहनशीलता का संदेश दे जाते हैं।

सुखद दांपत्य जीवन सिर्फ छोटी-छोटी चेष्टाओं और भावनाओं की ही अपेक्षा रखता है। एक स्त्री के कोमल भाव और पुरुष के मन की उहापोह को बताती है कविता आ गए तुम जिसे सुषमा गायकवाड़ ने बख़ूबी अभिनीत करते हुए कहती हैं कि "ड्योढ़ी के उस पायदान पर अपना अहम झाड़ कर आना और बाहर किलोलते बच्चों से थोड़ी शरारत मांग लाना।

आकाश वरटी एवं  प्रभात द्वारा अभिनित कविता अंतिम यात्रा डॉट कॉम हमें उस भयावह भविष्य की तस्वीर दिखा जाती है कि यदि रिश्तों की दूरियां इसी तरह बढ़ती रहीं तो अंत्येष्टि क्रिया भी एक संस्कार न रहकर व्यापार बन जाएजी उनका संवाद कि एक बात बताऊं बाबूजी अब कहां मिलते हैं रिटायर्ड मां-बाप को रिटायर्ड बहू-बेटा और बेटी की सेवा दवाई कईयों की बुकिंग तो उनके बेटों ने ही कराई है हमें सोचने पर मजबूर कर देते हैं।

टूटते बिखरे सम्मान और रिश्तों की इसी कहानी को आगे बयां करते रंजना ध्रुव द्वारा अभिनित कविता के संवाद .बेटा जब तै छोटे रहेस ना  मैं तोला आनिबानी के खिलौने लान के देवो। अऊ तै ओ खिलौना ला  टोर फोर के अपन मन बालावास। मैं तोर ऊपर कभू गुस्सा नहीं करेंव। अऊ आज तै मोर  ऊपर.......... यह निस्वार्थ माता-पिता के संघर्ष की कहानी कहते हैं।

अंत में कर्णप्रिय संगीतबद्ध कविता साधो ये मर्दों का गांव हमारे मन में सवाल छोड़ जाती है कि क्या हम  जिंदा हैं ? या मुर्दों के इस गांव के एक मुर्दा हैं। कार्यक्रम में अभिनीत कविताएं एवं कवियों के नाम कुछ इस प्रकार हैं हरे भरे पेड़- विनोद कुमार शुक्ल, आ गए तुम - निधि सक्सेना, दाई अऊ बेटा-सीमा श्रीवास्तव, कैकयी के राम-सुधीर श्रीवास्तव, स्मृति सुमन-सुनो गांधारी, श्रुति कुशवाहा-प्रेमिका, अंतिम यात्रा डॉट कॉम-कुमार जगदलवी, थोड़ी धरती पाऊं-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, साधो! ये मुर्दों का गांव - डॉ. लक्ष्मीकांत पंडा, स्त्री हूं -डॉ. अनुराधा दुबे की कविताओं पर मंच पर लोकेश साहू, सुषमा गायकवाड़, रंजना ध्रुव, अक्षरा मातुरकर, चंचल ध्रुव, सैयद आलीमन अली, आकाश वरठी-प्रभात साहू (संयुक्त), यमन साहू, टीम रंगभूमि (क्रमशः) अपनी प्रस्तुति दी। मंच व्यवस्था पर टीम रंगभूमि के नीरज सिंह ठाकुर, नितीश यादव, जयप्रकाश साहू, चैतन्य मोड़क, केशव साहू रहे। कार्यक्रम के निर्देशक आचार्य रंजन मोड़क ने किया।