रायपुर

मुनि श्री 108 आगम सागर जी महाराज ने बताया दान और त्याग का अलौकिक महत्व

रायपुर। धर्मसभा को संबोधित करते हुए पूज्य मुनि श्री 108 आगम सागर जी महाराज ने उत्तम त्याग धर्म के गूढ़ रहस्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि जैन शास्त्रों के अनुसार मनुष्य को सदैव अपने ही कृत कर्मों का फल प्राप्त होता है। त्याग और दान की महिमा को रेखांकित करते हुए मुनि श्री ने रामायण का एक सुंदर प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि श्री राम की माता पूर्व जन्म में अपने घर में मुनिराज के आहार हेतु नवधा भक्तिपूर्वक चौक लगाती थीं और बच्चों से मुनिराज का पड़गाहन करने को कहती थीं। परंतु बच्चे खेलकूद में व्यस्त रहने के कारण पड़गाहन के समय मुनिराज के समक्ष न जाकर बाद में केवल आहार की कुशलक्षेम पूछते थे। पूर्व जन्म में मुनिराज के पड़गाहन का पावन अवसर गंवाने के कारण ही श्री राम को राजसिंहासन प्राप्त होने के ऐन वक्त पर वनवास जाना पड़ा। यह प्रसंग शिक्षा देता है कि दान और भक्ति के अवसरों को कभी व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।

दान के महत्व पर देशना देते हुए मुनि श्री ने कहा कि संसार में दान देने वाले का नाम सदा प्रथम आता है। दान से व्यक्ति की यश और कीर्ति किसी मांग के बिना ही पूरी दुनिया में फैलती है। त्याग और दान से कभी धन या वैभव घटता नहीं, बल्कि बहुगुणी होकर बढ़ जाता है। जो जीव नम्रता और विनय भाव के साथ दान देता है, उसका सर्वत्र आदर-सत्कार होता है। विनयपूर्वक दिया गया दान जीव के निर्वाण प्राप्त कर लेने के पश्चात भी युगों-युगों तक उसकी यश-कीर्ति को जीवित रखता है। जिस प्रकार भरत को राजपद मिला, उसी प्रकार सच्चा दान दाता को समस्त सुख प्रदान करता है। मुनि श्री ने प्रेरणा दी कि जिनके पास तन, मन या धन का सुख नहीं है, उन्हें दान अवश्य देना चाहिए, क्योंकि दान देने से ही आगामी भवों में समस्त सुखों की प्राप्ति होती है।

प्रवचन के दौरान मुनि श्री ने जैन परंपरा के अनुसार आठ प्रमुख दानों और धर्म कार्यों का उल्लेख किया, जिससे जीव की यशोपताका संपूर्ण लोक में फहराती है: जिन मंदिर का निर्माण करवाना ,जिन बिंब की स्थापना करवाना,पवित्र तीर्थ क्षेत्रों की यात्रा करना,पंचकल्याणक महोत्सव करवाना,पूज्य मुनिराजों को नवधा भक्ति से आहार कराना,मुनिराजों के विहार में वैयावृत्ति और सहयोग देना,ज्ञान दान एवं शास्त्र स्वाध्याय में सहयोग करना,औषध एवं अभय दान प्रदान करना

मुनि श्री ने स्पष्ट किया कि मुनि जीवन स्वयं ज्ञान दान और संयम का दान देता है, जबकि श्रावक का परम कर्तव्य आहार दान, औषध दान, अभय दान और आवास दान देना है। उन्होंने ताकीद की कि तप और त्याग करने वाले साधक को कभी भी अभिमान नहीं करना चाहिए। दिगंबर मुद्रा और वीतरागी संतों की कृपा से ही जीव को संसार के सारे सुख प्राप्त होते हैं और दान देने का यह अनंत पुण्य जन्म-जन्मांतर तक अपार सुखों का कारण बनता है।

अपने प्रवचन के अंत में मुनि श्री ने संसार चक्र के कारणों पर सचेत करते हुए कहा कि ऋण, हत्या और बैर भाव ऐसी तीन चीजें हैं जो जीव के पुनर्जन्म और निरंतर संसार भ्रमण का मुख्य कारण बनती हैं। इसलिए प्रत्येक भव्य जीव को इन तीनों से सदैव बचकर उत्तम त्याग धर्म को अपने जीवन में धारण करना चाहिए।