बातें बीते समय की..... फोटोकॉपी मशीन आने से पहले लोग सर्टिफिकेट का डुप्लीकेट कैसे बनवाते थे ?
गोकुल सोनी वरिष्ठ छायाकार
डेस्क। आज किसी दस्तावेज की फोटोकॉपी चाहिए तो बस दुकान पर जाइए, मूल कागज दुकानदार को दीजिए और कुछ ही सेकंड में उसकी कई प्रतियां आपके हाथ में होती हैं। न कोई झंझट, न ज्यादा इंतजार। लेकिन जरा सोचिए, जब फोटोकॉपी मशीन ही नहीं थी, तब लोग अपने जरूरी कागजों की दूसरी प्रति कैसे बनवाते होंगे?
आज की नई पीढ़ी के लिए शायद यह बात किसी किस्से जैसी लगे, लेकिन 70-80 के दशक तक मार्कशीट, ट्रांसफर सर्टिफिकेट या किसी दूसरे जरूरी दस्तावेज की प्रतिलिपि बनवाना अपने आप में एक पूरा काम हुआ करता था। आइए, आज उसी दौर की एक छोटी-सी यात्रा करते हैं।
जब फोटोकॉपी मशीन का नहीं था नामोनिशान
70-80 के दशक में यदि स्कूल में एडमिशन लेना हो, नौकरी के लिए आवेदन करना हो या किसी सरकारी काम के लिए मार्कशीट अथवा ट्रांसफर सर्टिफिकेट की दूसरी प्रति जमा करनी हो, तो आज की तरह सीधे फोटोकॉपी नहीं करवाई जा सकती थी। क्योंकि तब यह मशीन थी ही नहीं। शहरों में स्टेशनरी की दुकानों पर मार्कशीट और ट्रांसफर सर्टिफिकेट के कोरे डुप्लीकेट फार्म मिला करते थे। इन फार्मों पर ऊपर “डुप्लीकेट” लिखा रहता था। अपनी असली मार्कशीट सामने रखकर उसमें लिखे अंक, स्कूल का नाम, जिला और दूसरी तमाम जानकारियां उस फार्म में सावधानी से लिखनी पड़ती थीं। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती थी।
डुप्लीकेट पर अधिकारी की मुहर जरूरी
फार्म भरने के बाद उसे किसी सरकारी दफ्तर के प्रथम श्रेणी अधिकारी यानी राजपत्रित अधिकारी—Gazetted Officer के पास ले जाना पड़ता था। दफ्तर में अधिकारी या उनके बाबू मूल दस्तावेज और तैयार किए गए डुप्लीकेट का मिलान करते थे। सब कुछ सही पाए जाने पर अधिकारी उस प्रतिलिपि पर अपने हस्ताक्षर करते और सरकारी मुहर लगाते। और हां, उस पर “सत्यप्रतिलिपि” भी लिखा जाता था। यानी आज जिस काम के लिए हम चंद सेकंड में फोटोकॉपी करवा लेते हैं, उसके लिए तब कागज तैयार करने से लेकर अधिकारी के हस्ताक्षर और मुहर तक कई चरणों से गुजरना पड़ता था।
शहर में फिर भी सुविधा थी… गांव में क्या होता था ?
अब जरा गांव की कल्पना कीजिए। शहर में तो स्टेशनरी की दुकान से डुप्लीकेट फार्म मिल जाता था, लेकिन हमारे जैसे गांव-देहात में रहने वालों के लिए वह भी आसान नहीं था। वहां कोई तैयार डुप्लीकेट फार्म नहीं मिलता था। इसलिए लोग अपनी मार्कशीट या ट्रांसफर सर्टिफिकेट को देखकर पेन या पेंसिल से हूबहू उसकी दूसरी प्रति तैयार करते थे।
कहां कितने अंक हैं, स्कूल का नाम क्या है, रोल नंबर क्या है, जिला कौन-सा है, हर जानकारी को बहुत सावधानी से उतारना पड़ता था। फिर इस तैयार किए गए कागज पर गांव के स्कूल के हेडमास्टर, प्राचार्य, ग्रामसेवक या किसी अधिकृत अधिकारी से हस्ताक्षर करवाए जाते थे। तब जाकर वह डुप्लीकेट दस्तावेज किसी काम लायक बनता था। आज की पीढ़ी को यह सब सुनकर शायद विश्वास ही न हो कि एक कागज की दूसरी प्रति तैयार करने के लिए भी इतना कुछ करना पड़ता था।
फिर आया फोटोकॉपी मशीन का जमाना
इसके बाद 80 और 90 के दशक में धीरे-धीरे फोटोकॉपी मशीनों का आगमन हुआ और कागज की प्रतिलिपि बनाने का तरीका ही बदल गया। लेकिन उस समय की फोटोकॉपी मशीनें आज जैसी छोटी और आसान नहीं थीं। वे इतनी बड़ी हुआ करती थीं कि उन्हें देखकर लगता था जैसे कमरे में कोई छोटी-मोटी मशीनरी खड़ी कर दी गई हो। कई मशीनें लगभग ऑटो, मेटाडोर या छोटी कार के आकार की लगती थीं और उनके लिए बाकायदा एक पूरा कमरा चाहिए होता था।
उस जमाने की फोटोकॉपी भी एक अजूबा थी
उन शुरुआती मशीनों की कार्यप्रणाली आज की मशीनों से बिल्कुल अलग और काफी जटिल थी। लकड़ी और एल्युमिनियम के फ्रेम वाली मशीन के अंदर एक चमकदार प्लेट होती थी। मूल दस्तावेज को मशीन में रखा जाता और उसके ऊपर से तेज रोशनी गुजरती। इस प्रक्रिया के बाद चमकदार प्लेट पर मूल दस्तावेज की आकृति उभरती थी। फिर उस प्लेट पर काले रंग का विशेष पाउडर डाला जाता। यह पाउडर दस्तावेज की बनी आकृति पर चिपक जाता, जबकि अतिरिक्त पाउडर नीचे ट्रे में गिर जाता। इसके बाद उस प्लेट पर कोरा कागज रखकर हल्का दबाव दिया जाता और दस्तावेज की आकृति कागज पर उभर आती। यानी एक फोटोकॉपी तैयार और अगर दस प्रतियां चाहिएं, तो यही प्रक्रिया बार-बार दोहरानी पड़ती थी। आज हम एक बटन दबाकर दस, बीस या पचास प्रतियां निकाल लेते हैं। उस समय एक-एक प्रति तैयार करना भी अपने आप में मेहनत का काम था।
“ यहां फोटो कॉपी होती है…”
उस दौर में फोटो कॉपी की दुकान पहचानने का भी अपना मजा था। दुकानों के सामने बड़े-बड़े बोर्ड लगे होते थे—
“यहां फोटोकॉपी की जाती है, कहीं लिखा होता था—“यहां जिरॉक्स होता है
कहीं “झीरॉक्स” लिखा मिलता था और कहीं सिर्फ “XERO”
हम जैसे गांव-देहात से आने वाले लोगों के लिए तो यह भी एक पहेली थी कि आखिर जिरॉक्स, झीरॉक्स और XERO में फर्क क्या है और इनमें से फोटोकॉपी कौन करता है ? बाद में समझ आया कि “Xerox” एक ब्रांड नाम था, लेकिन आम बोलचाल में फोटोकॉपी के लिए ही “जिरॉक्स” शब्द इस्तेमाल होने लगा।
रायपुर की शांति फोटोकॉपी
उस जमाने में रायपुर के तात्यापारा चौक में “शांति फोटोकॉपी” नाम की एक दुकान हुआ करती थी। वहां सामान्य A4 कागज से भी बड़े आकार की फोटोकॉपी हुआ करती थी। काम इतना ज्यादा था कि दिन-रात मशीन चलती रहती थी। सरकारी दफ्तरों के दस्तावेजों की फोटोकॉपी का काम भी वहां आया करता था। उस दौर में ऐसी दुकानें सिर्फ दुकान नहीं थीं, बल्कि धीरे-धीरे लोगों की जरूरत का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जा रही थीं।
फिर छोटी होती गईं मशीनें
समय के साथ फोटोकॉपी मशीनों का आकार छोटा होता गया। बड़ी-बड़ी मशीनों की जगह टेबल पर रखी जाने वाली मशीनें आ गयी। फिर तकनीक और आगे बढ़ी और छोटी, तेज तथा पोर्टेबल मशीनों का दौर शुरू हुआ। आज स्थिति यह है कि आप दुकानदार को एक हाथ से अपना कागज देते हैं और वह दूसरे हाथ से उसकी फोटोकॉपी करके आपको वापस कर देता है। कुछ सेकंड में काम खत्म। जिस काम के लिए कभी पूरा दिन लग सकता था, वह आज पलक झपकते हो जाता है।
एक मशीन ने सिर्फ कागज नहीं बदले, हमारी जिंदगी बदल दी
फोटोकॉपी मशीन की कहानी सिर्फ एक मशीन के विकसित होने की कहानी नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है जिसमें तकनीक ने हमारे रोजमर्रा के जीवन को धीरे-धीरे आसान बनाया। एक समय था जब किसी दस्तावेज की दूसरी प्रति तैयार करने के लिए उसे देखकर हाथ से लिखना पड़ता था, अधिकारी से सत्यापित करवाना पड़ता था और फिर उसे लेकर दफ्तर-दफ्तर जाना पड़ता था। फिर फोटोकॉपी मशीन आयी और वही काम आसान हो गया। आज तो मोबाइल से दस्तावेज की फोटो खींचकर, उसे स्कैन करके, पीडीएफ बनाकर और व्हाट्सऐप या ई-मेल से भेजकर हम कुछ ही मिनटों में वह काम कर लेते हैं, जिसके लिए कभी लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था। यानी तकनीक सिर्फ मशीनें छोटी नहीं करती, वह हमारे इंतजार को भी छोटा करती जाती है।
आपको फोटोकॉपी का पहला अनुभव कब हुआ ?
तो साथियो, यह थी फोटोकॉपी मशीन की कहानी। हाथ से तैयार की जाने वाली डुप्लीकेट मार्कशीट से लेकर सेकंडों में निकलने वाली डिजिटल फोटोकॉपी तक की कहानी। आज की पीढ़ी के लिए शायद यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि कभी एक कागज की दूसरी प्रति बनाने के लिए इतना समय, इतनी मेहनत और इतनी औपचारिकता करनी पड़ती थी। लेकिन हममें से जिन लोगों ने वह दौर देखा है, उनके लिए यह सिर्फ इतिहास नहीं, अपनी जिंदगी का एक हिस्सा है।
क्या आपको याद है कि आपने पहली बार फोटोकॉपी कब करवाई थी ? क्या आपने कभी हाथ से डुप्लीकेट मार्कशीट या ट्रांसफर सर्टिफिकेट बनाया है ? क्या कभी किसी गजेटेड ऑफिसर से उस पर हस्ताक्षर और मुहर लगवाई है ? क्योंकि पुरानी चीजों की सबसे खूबसूरत बात यही है वे सिर्फ बीते हुए समय की कहानी नहीं सुनातीं, वे हमें यह भी याद दिलाती हैं कि हम कितनी दूर आ चुके हैं।
साभारः (इंटरनेट मीडिया)