“छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” छत्तीसगढ़ की मेहनतकश जनता के गौरव का उद्घोष
गणेशा जाधव पाटिल, रायपुर।
“छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” केवल एक नारा नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की अस्मिता, स्वाभिमान, सांस्कृतिक समृद्धि और मेहनतकश जनता के गौरव का उद्घोष है। यह उस धरती की पहचान है, जहाँ किसानों का परिश्रम, जनजातीय समाज की परंपराएँ, लोककलाकारों की साधना, प्राकृतिक संपदा और सामाजिक सद्भाव मिलकर एक विशिष्ट सांस्कृतिक संसार रचते हैं। इसका वास्तविक अर्थ दूसरों से श्रेष्ठ होने का दावा करना नहीं, बल्कि अपनी विरासत पर गर्व करते हुए अपने राज्य को निरंतर बेहतर बनाने का संकल्प लेना है।
1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से पृथक होकर छत्तीसगढ़ भारत का 26वाँ राज्य बना। आज, 1 नवंबर 2026 को, हम राज्य का 26वाँ स्थापना दिवस मना रहे हैं। यह अवसर केवल उत्सव का नहीं, बल्कि अपने गौरवशाली अतीत को स्मरण करने, वर्तमान की उपलब्धियों का मूल्यांकन करने और विकसित छत्तीसगढ़ के निर्माण का संकल्प दोहराने का भी है।
इतिहास की जड़ों में बसा छत्तीसगढ़ का गौरव
छत्तीसगढ़ का इतिहास प्राचीन दक्षिण कोसल की गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा है। सिरपुर, मल्हार, रतनपुर और राजिम जैसे ऐतिहासिक स्थल इस क्षेत्र की प्राचीन सभ्यता, स्थापत्य कला, धार्मिक सहअस्तित्व और सांस्कृतिक विकास के महत्त्वपूर्ण प्रमाण हैं। महानदी और उसकी सहायक नदियों ने यहाँ कृषि, व्यापार, बस्तियों तथा सामाजिक जीवन के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
‘छत्तीसगढ़’ नाम की उत्पत्ति के संबंध में एक लोकप्रिय मान्यता इसे छत्तीस गढ़ों अथवा किलों से जोड़ती है। इस व्याख्या की ऐतिहासिक पुष्टि के लिए और शोध की आवश्यकता है, लेकिन यह नाम आज हमारी साझा पहचान और क्षेत्रीय गौरव का प्रतीक बन चुका है।
छत्तीसगढ़ का इतिहास किसी एक राजवंश या समुदाय तक सीमित नहीं है। इसे विभिन्न शासकों, जनजातीय समाजों, किसानों, शिल्पकारों, संतों और लोकपरंपराओं ने मिलकर आकार दिया है। इस इतिहास का निष्पक्ष अध्ययन और प्रमाणिक तथ्यों का संरक्षण हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है।
मराठा विरासत और ऐतिहासिक संबंध
छत्तीसगढ़ के इतिहास में मराठा शासन का भी उल्लेखनीय स्थान है। अठारहवीं शताब्दी में नागपुर के भोंसले राजवंश का इस क्षेत्र की राजनीति और प्रशासन पर प्रभाव स्थापित हुआ। भोंसले शासक बिंबाजी भोंसले का नाम रतनपुर तथा छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक इतिहास से विशेष रूप से जुड़ा है। सामान्य ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उन्होंने लगभग 1758 से 1787 तक इस क्षेत्र में शासन किया।
रायपुर के दूधाधारी मंदिर, रतनपुर की रामटेकरी और महामाया मंदिर परिसर से संबंधित कुछ स्थानीय परंपराएँ मराठा काल की गतिविधियों की ओर संकेत करती हैं। रतनपुर के खंडोबा-भवानी मंदिर से जुड़ी परंपराएँ भी छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के सांस्कृतिक संबंधों के अध्ययन की संभावनाएँ प्रस्तुत करती हैं। महाराष्ट्र के जेजुरी स्थित खंडोबा मंदिर की मराठा समाज में विशेष धार्मिक महत्ता है।
रायपुर के गोल बाजार के इतिहास को भी स्थानीय स्तर पर मराठा काल से जोड़कर देखा जाता है, हालाँकि इसके निर्माण और विकासक्रम की पुष्टि के लिए अभिलेखीय शोध आवश्यक है। दूसरी ओर, सिरपुर का प्राचीन गंधेश्वर मंदिर और राजिम का राजीव लोचन मंदिर इस क्षेत्र की उससे भी पुरानी ऐतिहासिक विरासत के महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं।
इन ऐतिहासिक संबंधों का उद्देश्य किसी एक समुदाय के योगदान को सर्वोपरि स्थापित करना नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की बहुआयामी विरासत को समझना है। ऐतिहासिक स्थलों का संरक्षण, अभिलेखों का डिजिटलीकरण और छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र के साझा इतिहास पर शोध हमारी सांस्कृतिक समझ को और समृद्ध कर सकता है।
लोकसंस्कृति है छत्तीसगढ़ की आत्मा
छत्तीसगढ़ की वास्तविक शक्ति उसके लोकजीवन और सांस्कृतिक विविधता में दिखाई देती है। पंथी, राउत नाचा, सुआ, करमा और पंडवानी जैसी लोककलाएँ पीढ़ियों से हमारी सांस्कृतिक चेतना को जीवंत रखे हुए हैं। पंडवानी की महान कलाकार तीजन बाई ने छत्तीसगढ़ की लोककला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
हरेली, तीजा, पोला और छेरछेरा जैसे त्योहार कृषि, प्रकृति, पारिवारिक संबंधों और सामुदायिक सहयोग की भावना को मजबूत करते हैं। बस्तर दशहरा अपनी विशिष्ट परंपराओं, जनभागीदारी और सांस्कृतिक विशेषताओं के कारण देशभर में अलग पहचान रखता है।
छत्तीसगढ़ी भाषा, लोकगीत, पारंपरिक भोजन, हस्तशिल्प और जनजातीय ज्ञान हमारी सांस्कृतिक पूँजी हैं। महानदी, शिवनाथ और इंद्रावती जैसी नदियाँ, विस्तृत वन तथा चित्रकोट जलप्रपात राज्य की प्राकृतिक संपदा और पर्यटन की संभावनाओं को उजागर करते हैं। अपनी भाषा बोलना, स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहित करना, पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण करना और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना ही सांस्कृतिक स्वाभिमान का वास्तविक स्वरूप है।
विरासत से विकास की ओर
छत्तीसगढ़ ने अपनी स्थापना के बाद विकास की नई यात्रा तय की है। कृषि, खनिज संसाधन, ऊर्जा, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना राज्य की प्रगति के महत्त्वपूर्ण क्षेत्र हैं। फिर भी विकास की वास्तविक सफलता का आकलन इस बात से होना चाहिए कि उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक कितना पहुँचता है।
किसानों की समृद्धि, युवाओं के लिए रोजगार, महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएँ और जनजातीय क्षेत्रों का संतुलित विकास हमारी प्राथमिकताएँ होनी चाहिए। स्थानीय संसाधनों का उपयोग पर्यावरण संरक्षण और जनहित को ध्यान में रखकर किया जाना आवश्यक है।
ऐतिहासिक धरोहरों को शिक्षा, शोध और पर्यटन से जोड़कर रोजगार के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं। सिरपुर, रतनपुर, मल्हार, राजिम और रायपुर जैसे स्थलों पर वैज्ञानिक शोध, स्मारकों का संरक्षण, प्रमाणिक प्रकाशनों का प्रकाशन तथा सांस्कृतिक पर्यटन को प्रोत्साहन देना चाहिए। इससे इतिहास सुरक्षित रहेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बल मिलेगा।
छत्तीसगढ़िया होना गौरव भी, जिम्मेदारी भी
राज्य के 26वें स्थापना दिवस पर हमें यह समझना होगा कि केवल अतीत का गौरव गाना पर्याप्त नहीं है। उस गौरव के अनुरूप वर्तमान का निर्माण करना और भविष्य को बेहतर बनाना भी हमारा कर्तव्य है।
हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम अपनी भाषा, संस्कृति, इतिहास और प्राकृतिक संपदा का सम्मान करेंगे; ऐतिहासिक शोध को प्रोत्साहित करेंगे; लोककलाओं को नई पीढ़ी तक पहुँचाएँगे; सामाजिक सद्भाव बनाए रखेंगे और विकास के अवसरों को अधिक समावेशी बनाएँगे।
“छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” तभी सार्थक होगा, जब हमारा छत्तीसगढ़ इतिहास के प्रति जागरूक, संस्कृति के प्रति संवेदनशील, आर्थिक रूप से सशक्त, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार और सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्ध बनेगा।
आइए, हम सब मिलकर ऐसा छत्तीसगढ़ बनाएँ जहाँ विरासत सुरक्षित हो, किसानों को सम्मान मिले, युवाओं को अवसर मिलें, महिलाएँ आत्मनिर्भर बनें, जनजातीय संस्कृति को उचित सम्मान मिले और प्रत्येक नागरिक राज्य की प्रगति में सहभागी बने। हमारा अभिमान केवल नारों में नहीं, बल्कि हमारे कर्मों, उपलब्धियों और सामूहिक प्रयासों में दिखाई देना चाहिए।
छत्तीसगढ़ की माटी को नमन!
जय जोहार! जय छत्तीसगढ़!
छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया
(लेखक: सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्वतंत्र इतिहास शोधकर्ता)