शिखंडी’ की वेदना में भारी पड़ी दर्शकों की संवेदना.... दिखा संघर्ष और बदलाव
2025-08-31 08:54 AM
270
- महाराष्ट्र मंडल में मेजर यशवंत गोरे गणेशोत्सव के चौथे दिन दर्शकों से खचाखच भरे संत ज्ञानेश्वर सभागृह के कुमुदिनी वरवंडकर स्मृति रंगमंच पर भरत वेद लिखित नाटक ‘शिखंडी’ का हुआ मंचन
रायपुर। किन्नर जिसे पैराणिक कथाओं में ‘शिखंडी’ भी कहा गया है, वे भी इंसान होते हैं। उन्हें भी दर्द होता है। वह भी प्यार को महसूस कर सकते हैं, मगर आज हमारा समाज उन्हें मुख्यधारा से अलग ही रखता है। नाटक ‘शिखंडी’ में वर्ग विशेष के दर्द को दिखाने की कोशिश की गई। नाटक का मंचन इतना प्रभावी था कि ‘शिखंडी’ की वेदना पर दर्शकों की संवेदना भारी पड़ती नजर आई। नाटक में ‘शिखंडी’ का संघर्ष और बदलाव भी नजर आया। अवसर था महाराष्ट्र मंडल के शहीद मेजर यशवंत गोरे स्मृति गणेशोत्सव के चौथे दिन हिंदी नाटक ‘शिखंडी’ के मंचन का।
आचार्य रंजन मोड़क के निर्देशन में लेखक भरत वेद लिखित नाटक ‘शिखंडी’ का मंचन किया गया। नाटक में समाज के हाशिए पर पड़े थर्ड जेंडर समुदाय की जीवन स्थितियों और संघर्षों को संजीदगी से दर्शाया गया। नाटक में किन्नरों की कठिनाइयों, उनके अधिकारों की लड़ाई और समाज में उन्हें मिलने वाले असमान व्यवहार को गहरे और संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया। साहित्य के विद्वान 'शिखंडी' को हिन्दी साहित्य का प्रथम किन्नर केंद्रित नाटक मानते हैं।
'शिखंडी' में रमजानी की भूमिका में सुषमा गायकवाड़, नरमादा की फोटो किरदार आकाश वरठी और किरण की भूमिका में प्रांजल सिंह राजपूत प्रभावित करते हैं। वहीं शोभाराम- नितीश यादव, नेता दौलतराम- जयप्रकाश साहू, तेजा- सुमन त्यागी, शंखनाद- शंकर झारिया, पत्रकार- लोकेश साहू और दुकानदार- वेदराम यादव अपनी-अपनी भूमिका में जमे हैं। किन्नर की भूमिकाओं में वंदना फूलबांधे, चंचल ध्रुव, अक्षदा मातुरकर ध्यान खीचतीं हैं। नाटक के सूत्रधार चैतन्य मोडक और फूलबासन ट्विंकल परमार हैं।
-----
*कुछ संवाद ये भी..........*
नरमादाः मैं गलत शरीर में पैदा हुई। लड़के के शरीर में लड़की वाला एहसास होता है। बनावट पुरुषों वाली और अंदर से हम महिला होती हैं..... हमें सजना संवरना, लिपिस्टिक, बिंदी सब पसंद है।
नरमादाः बहुत हो गया पाखंड। तुम्हारे खोखले आदर्श और झूठे आश्वासन को हम अच्छी तरह जान गए है। सारे नेता एक ही संस्कार की औलाद हैं और वो है पाखंड... पाखंड,...पाखंड
नरमादाः जब तक इन दोगले लोगों को जनता के दरबार में अदालत लगाकर दंड नहीं देगें, तब तक इनके पाखंड का केचुल नहीं उतरेगा। दो साल हो गया चुनाव जीते आज चेहरा दिखा रहे हैं।
किरण: मेरे पिता ने तो मुझे अपनी औलाद मानने से इंकार कर दिया था। सबकी जरूरत पूरी होती है, सबकी खुशियों का ख्याल होता है। बस एक मेरे साथ बदनसीबी का बवंडर रहता है। ठुकराये हम जाते हैं, कोसे हम जाते हैं।
रमजानीः तुम ठीक ही कहती हो किरण..। ये सभ्य लोग... हमें अलग कर दिए हैं। हम इनकी दुनिया में रहकर भी इनकी दुनिया से अलग हैं/। हमने कदम-कदम पर उपेक्षाएं झेली हैं, क्या परिवार की... क्या लोगों की...