0- महाराष्ट्र मंडल के शिवाजी महाराज सभागृह में आयोजित गरिमामय कार्यक्रम में पद्मश्री डॉ. सुनीता गोडबोले ने कहा- वनवासियों को हम समझें, उन्हें हमारी जरूरत है
रायपुर। अपना ऐश्वर्य, सुख- सुविधाओं को छोड़कर बस्तर के बीहड़ जंगलों में आदिवासियों की चिकित्सा व सामाजिक सेवा कर रहे डाॅ. गोडबोले दंपती आज के समय के वीर सावरकर से कम नहीं है। विनायक दामोदर सावरकर ने भी अपनी विदेश की ली हुई शिक्षा, ऐशो आराम को छोड़कर देश को स्वतंत्र कराने का बीड़ा उठाया था। स्वतंत्रता आंदोलन में ब्रिटिश हुकूमत से टकराने के लिए उन्होंने काला पानी की सजा सुनाई गई। अंडमान के सेल्यूलर जेल में उन्हें अकल्पनीय यातानाएं दी गईं। पद्मश्री डॉ. रामचंद्र त्र्यंबक गोडबोले व उनकी पत्नी डॉ. सुनीता रामचंद्र गोडबोले के सम्मान समारोह में इस आशय के प्रेरक विचार महाराष्ट्र मंडल के अध्यक्ष अजय मधुकर काले ने व्यक्त किए।
वीर सावरकर जयंती के उपलक्ष्य पर आयोजित इस समारोह में काले ने कहा कि आज की तनावग्रस्त युवा पीढ़ी यदि एक बार विनायक दामोदर सावरकर की जीवनी को पढ़ ले, तो उनके दिमाग से तनाव निकल जाएगा। बात- बात तनावग्रस्त होकर अवसाद में चले जाने वाले हमारे युवा, जल्दी ही आक्रोशित होकर कुछ कर बैठने को लालायित हमारी जेन जी को चाहिए कि वे सावरकर के बारे में अधिक से अधिक पढ़ने और जानने की कोशिश करें। क्योंकि सार्थक व उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने की जो सीख सावरकर के व्यक्तित्व से मिल सकती है, वह किसी और से नहीं।
इधर पद्मश्री डॉ. सुनीता गोडबोले ने कहा कि पूरा बस्तर राजधानी रायपुर की ओर से बड़ी आशाभरी नजरों से देखता है क्योंकि रायपुर में हर तरह की सुविधाएं हैं, जबकि वहां सुविधाओं का अभाव है। अब राजधानीवासी यदि वनवासियों को, उनकी अपेक्षाओं व आकांक्षाओं को नहीं समझेंगे, तो दोनों के बीच का अंतर बढता चला जाएगा। सुदूर वनांचल में रह रहे आदिवासी आज भी पढ़े लिखे, सूट- बूट पहनने वालों से बात करने में हिचकते हैं, संकोच करते हैं। लेकिन उन लोगों को हमारी जरूरत है। राष्ट्रीय सेवा योजना, माय भारत के युवा या अन्य कोई सेवाभावी संगठन को उनकी सेवा के लिए वनांचल तक पहुंचना चाहिए।
डा. सुनीता ने कहा कि वनांचल ही नहीं, शहरों में भी संवेदनशील लोग रहते हैं। आज उन्हें सही दिशा दिखाने की जरूरत है। अभावग्रस्त, वंचितों की सहायता के लिए हमेशा आगे रहना चाहिए। 36 साल पहले वनवासी कल्याण आश्रम के माध्यम से जब वे अपने पति के साथ बस्तर के बारासुर, अबूझमाड़ में अपनी सेवाएं देने पहुंचीं, तो उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। वनवासियों में यह भावना जगाने के लिए कि हम उनके शुभचिंतक हैं, उन्हें मडिया बोली सीखनी पड़ी। स्थानीय बोली के कारण वनवासियों को हमारे साथ अपनापन महसूस हुआ और फिर उन्होंने हमें भरपूर सहयोग भी दिया।
इस मौके पर बृहन्महाराष्ट्र मंडल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शेखर राव साहेब अमीन, छत्तीसगढ़ प्रभारी सुबोध टोले ने भी कार्यक्रम को संबोधित किया। सावरकर जयंती पर आयोजित समारोह का संचालन उपाध्यक्ष गीता श्याम दलाल और सचिव चेतन गोविंद दंडवते ने किया। आभार प्रदर्शन महाराष्ट्र मंडल की साहित्यिक समिति की प्रभारी कुमुद लाड की ओर से किया गया। इस मौके पर उपस्थित बड़ी संख्या में लोगों ने डॉक्टर गोडबोले दंपती के साथ सेल्फी लेते हुए, फोटो खिंचवाते हुए गौरवान्वित महसूस किया।