विहिप की केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल बैठक सम्पन्न: अल्पसंख्यक की परिभाषा तय हो, जिहाद की जड़ कट्टरता में – संतों ने रखी कड़ी राय
2025-12-11 10:10 AM
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नई दिल्ली| विश्व हिंदू परिषद् की दो दिवसीय केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल की बैठक बुधवार को दिल्ली के बाबा नत्था सिंह वाटिका में सम्पन्न हो गई। देशभर से आए विभिन्न हिंदू संप्रदायों के 225 वरिष्ठ संतों ने इसमें हिस्सा लिया। बैठक के बाद विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने पत्रकारों को बताया कि तीन प्रमुख मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई और स्पष्ट मत बने।
धार्मिक अल्पसंख्यक की परिभाषा तय हो
परिषद ने कहा कि भारतीय संविधान में धार्मिक अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार दिए गए हैं, लेकिन “धार्मिक अल्पसंख्यक” शब्द की कोई परिभाषा ही नहीं है। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम-1992 में केंद्र सरकार को मनमाने ढंग से किसी भी धर्म को अल्पसंख्यक घोषित करने का अधिकार है।
मार्गदर्शक मंडल का स्पष्ट मत है कि अब इस शब्द को परिभाषित किया जाए। परिभाषा में यह देखा कि क्या उस धर्म के अनुयायियों को भारत में कभी धर्म के नाम पर उत्पीड़न या भेदभाव सहना पड़ा है? क्या वे शिक्षा, अर्थव्यवस्था या सामाजिक स्थिति में पिछड़े हैं?
आलोक कुमार ने कहा, “भारत के इतिहास में मुस्लिम और ईसाई समुदाय को कभी धर्म के आधार पर उत्पीड़न नहीं सहना पड़ा। 2011 की जनगणना में मुस्लिम आबादी 14% से अधिक थी, अब अनुमान 18-20% तक है। ऐसे में धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक दर्जा बनाए रखना उचित है या नहीं – इस पर खुली राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए।”
जिहाद की जड़ गरीबी नहीं, कट्टर धार्मिकता में
बैठक में लाल किले पर हालिया बम विस्फोट मामले का जिक्र हुआ। जांच में पता चला कि हमलावर गरीब या पिछड़े नहीं, बल्कि उच्च शिक्षित, उच्च आय वर्ग और सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित लोग थे। एक प्रमुख विश्वविद्यालय जिहादियों की भर्ती, कट्टरता फैलाने और आतंकी प्रशिक्षण का केंद्र बना हुआ है।
विहिप अध्यक्ष ने कहा, “जिहादी मानसिकता सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है। इस्लाम का एक वर्ग जिहाद को धार्मिक फर्ज मानता है और इसमें धोखा, लूट, अपहरण व नृशंस हत्याओं को जायज ठहराता है। लोकतंत्र व वैचारिक स्वतंत्रता के युग में ऐसी मानसिकता को कोई स्थान नहीं। वैचारिक, सामाजिक और कानूनी स्तर पर इसका कठोर प्रतिरोध जरूरी है।”
न्यायपालिका पर दबाव की निंदा
बैठक में तमिलनाडु हाईकोर्ट के जज जीआर स्वामीनाथन के खिलाफ डीएमके और शिवसेना (उद्धव गुट) के इशारे पर महाभियोग प्रस्ताव लाने की कोशिश की कड़ी निंदा की गई। परिषद ने कहा कि किसी न्यायाधीश के फैसले से असहमति हो तो सुप्रीम कोर्ट में अपील का रास्ता है, लेकिन महाभियोग लाकर न्यायपालिका पर दबाव बनाना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
बैठक में मौजूद संतों ने इन तीनों मुद्दों पर एक स्वर से प्रस्ताव पारित किए और सरकार से इन पर त्वरित कार्रवाई की मांग की।