पाताल से खींच लाई सच: बेटे की मौत पर बंद हुई फाइल, मां ने डेढ़ साल में ढूंढ निकाला हत्यारा
2026-04-09 01:30 PM
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दर्द से पैदा हुई जिद, जिद से निकला इंसाफ का रास्ता
देहरादून| सड़क हादसों की खबरें अक्सर अखबारों की सुर्खियां बनती हैं और फिर समय के साथ धुंधली हो जाती हैं। लेकिन कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जो खत्म नहीं होतीं, बल्कि एक नई शुरुआत बन जाती हैं। देहरादून की एक मां की कहानी भी ऐसी ही है, जिसने अपने बेटे को खोने के बाद हार मानने के बजाय उस दर्द को अपनी ताकत बना लिया। पुलिस ने जिस केस की फाइल बंद कर दी थी, उस फाइल को उसने अपनी जिद और हौसले से फिर से खोल दिया।
वो मनहूस दिन जिसने सब कुछ बदल दिया
16 फरवरी 2024 की तारीख एक परिवार के लिए कभी न भूलने वाला दिन बन गई। प्रेमनगर इलाके में सड़क पार करते वक्त 18 साल के क्षितिज को एक तेज रफ्तार डंपर ने टक्कर मार दी। हादसा इतना गंभीर था कि उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन अगले दिन उसकी मौत हो गई। एक होनहार युवक, जो भर्ती परीक्षा की तैयारी कर रहा था, अचानक इस दुनिया से चला गया और पीछे छोड़ गया टूटता हुआ परिवार।
पुलिस की बंद फाइल और मां की खुली जंग
हादसे के बाद परिवार को पुलिस से इंसाफ की उम्मीद थी, लेकिन जब जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट लगाकर केस बंद कर दिया और यह कह दिया कि आरोपी का कोई सुराग नहीं मिला, तो यह उम्मीद भी टूट गई। लेकिन मां ललिता चौधरी ने हार नहीं मानी। उन्होंने उसी दिन ठान लिया कि चाहे जितना समय लगे, वह अपने बेटे के कातिल को ढूंढकर रहेंगी।
हर दिन की तपस्या: सीसीटीवी और सवालों की तलाश
इसके बाद शुरू हुई एक मां की अनोखी लड़ाई। ललिता चौधरी रोज सुबह घर से निकलतीं और पूरे दिन घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालती रहतीं। घंटों वीडियो देखना, राहगीरों से पूछताछ करना और हर छोटी-बड़ी जानकारी को जोड़ना उनका रोज का काम बन गया। इसी लगातार मेहनत के दौरान उन्होंने करीब 10 संदिग्ध लोगों की पहचान की और उनके बारे में जानकारी जुटानी शुरू कर दी।
डेढ़ साल की मेहनत और आखिरकार मिली कामयाबी
समय बीतता गया, लेकिन मां की उम्मीद और मेहनत कम नहीं हुई। करीब डेढ़ साल बाद आखिरकार उनकी कोशिश रंग लाई। उन्होंने न सिर्फ उस डंपर को ढूंढ निकाला, बल्कि उसके चालक की भी पहचान कर ली। यह एक ऐसी सफलता थी, जो किसी पुलिस जांच से नहीं, बल्कि एक मां के अटूट विश्वास और संघर्ष से मिली थी।
सबूतों के साथ फिर खटखटाया पुलिस का दरवाजा
जब ललिता चौधरी के पास पुख्ता सबूत आ गए, तो उन्होंने उन्हें इकट्ठा कर पुलिस अधिकारियों को सौंप दिया और मामले की दोबारा जांच की मांग की। अब पुलिस एक बार फिर इस केस की जांच में जुट गई है और अधिकारियों ने भरोसा दिलाया है कि दोषी को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा।
मां की मिसाल और इंसाफ की प्रतीक्षा
यह कहानी सिर्फ एक हादसे की नहीं, बल्कि एक मां के अदम्य साहस की है। जिस केस को सिस्टम ने खत्म मान लिया था, उसे एक मां ने जिंदा कर दिया। यह साबित करता है कि मां से बड़ा कोई योद्धा नहीं होता। अब सवाल सिर्फ इतना है कि इतने सबूतों और संघर्ष के बाद आखिर कब क्षितिज को इंसाफ मिलेगा।