काशी की काव्यधारा में गूंजा नारी शक्ति का स्वर, काव्यार्चन का 58वां सत्र बना वंदन का उत्सव
2026-04-29 03:25 PM
17
वाराणसी| वाराणसी में एक ओर जहां देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीएलडब्ल्यू ग्राउंड में आयोजित नारी शक्ति वंदन सम्मेलन में शामिल होकर महिला सशक्तिकरण का संदेश दे रहे थे, वहीं दूसरी ओर काशी की सांस्कृतिक धरती पर साहित्य और संवेदना का अनूठा संगम देखने को मिला। असी घाट स्थित सुबह-ए-बनारस आनंद कानन के मंच पर काव्य प्रकल्प के अंतर्गत काव्यार्चन का 58वां सत्र नारी वंदन को समर्पित रहा, जहां शब्दों ने स्त्री शक्ति को प्रणाम किया और भावनाओं ने उसे नई ऊंचाई दी।
नारी वंदना से हुई सत्र की शुरुआत, गीतों में झलकी शक्ति की पहचान
मंगलवार को आयोजित इस विशेष सत्र की शुरुआत युवा कवयित्री डॉ. अंजना त्रिपाठी ने की, जिन्होंने अपने विस्तृत गीत के माध्यम से नारी की महिमा का बखान किया। उनके शब्दों में नारी केवल कोमलता का प्रतीक नहीं, बल्कि सृजन और संहार दोनों की शक्ति के रूप में उभरी। उनके गीत की पंक्तियां “नारी तू अबला नहीं, शक्ति का अवतार है, सृजन तुझसे, संहार तुझसे, तू संसार का सार है” पूरे वातावरण में गूंजती रहीं और श्रोताओं को भावविभोर कर गईं।
उदीयमान रचनाकारों ने भी दी नारी शक्ति को स्वर
सत्र को आगे बढ़ाते हुए नगर की उदीयमान रचनाकार पूनम गुप्ता ‘पूर्वी’ ने अपनी रचना के माध्यम से नारी के संघर्ष और संवेदनाओं को अभिव्यक्ति दी। उनकी पंक्तियां “ये पांवों के घुंघरू, मेरी बेबसी का शोर हैं, मेरी तक़दीर की ये, एक कच्ची सी डोर हैं” ने नारी जीवन के उन पहलुओं को सामने रखा, जो अक्सर अनकहे रह जाते हैं।
हास्य और संवेदना के संगम में झलकी मातृशक्ति की महिमा
वरिष्ठ हास्य रचनाकार एड. रुद्रनाथ त्रिपाठी ‘पुंज’ ने भी इस अवसर पर मातृशक्ति को समर्पित रचना प्रस्तुत की। इसके बाद उन्होंने एक और भावपूर्ण कविता सुनाई, जिसमें बचपन की मासूमियत और स्मृतियों की मिठास को उकेरा गया। उनकी पंक्तियां “तन कोमल था, मन भी निर्मल, भाव बड़े सच्चे थे, बचपन के घाव, बहुत अच्छे थे” श्रोताओं के दिलों को छू गईं।
अध्यक्षीय संबोधन में नारी विजय का आह्वान और सामाजिक कटाक्ष
सत्र की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ रचनाकार डॉ. नागेश शांडिल्य ने अपनी रचना “राष्ट्र भवन में बस जय जय हो, नारी तेरी सदा विजय हो...” के माध्यम से नारी शक्ति को नमन किया। इसके साथ ही उन्होंने अपने सहज हास्य के जरिए सामाजिक और पारिवारिक विसंगतियों पर तीखा लेकिन संतुलित कटाक्ष भी किया, जिससे माहौल में विचार और मनोरंजन दोनों का संतुलन बना रहा।
संयोजन और संचालन ने बांधा कार्यक्रम का सजीव स्वरूप
काव्यार्चन के इस 58वें सत्र का संयोजन सुबह-ए-बनारस आनंद कानन के संस्थापक सचिव डॉ. रत्नेश वर्मा ने किया, जबकि संचालन संस्कृतिधर्मी अरविन्द मिश्र ‘हर्ष’ ने अपनी विशिष्ट शैली में किया। उनके संचालन ने पूरे कार्यक्रम को एक सुसंगत और जीवंत रूप प्रदान किया।
साहित्यिक उपस्थिति से सजा आयोजन, काशी की सांस्कृतिक परंपरा हुई प्रकट
इस अवसर पर प्रियंका अग्निहोत्री ‘गीत’, डॉ. प्रतापशंकर दूबे, राजलक्ष्मी मिश्रा ‘मन’, अनु मिश्रा, जया टंडन, विजयचंद्र त्रिपाठी, विजय उपाध्याय, अखलाक खान ‘भारतीय’, परमहंस तिवारी ‘परम’ और आनंदकृष्ण ‘मासूम’ सहित कई वरिष्ठ और युवा रचनाकारों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को गरिमा प्रदान की। काशी की यह काव्य संध्या एक बार फिर यह साबित कर गई कि यहां शब्द केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि संस्कृति और संवेदना की जीवंत धारा हैं।