इलाज बना खतरा: वाराणसी में मातृत्व पर मंडराता मौत का साया, 22 महीनों में 190 गर्भवती महिलाओं की गई जान
2026-04-15 08:05 AM
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वाराणसी| वाराणसी में मातृत्व अब खुशी से ज्यादा खतरे का पर्याय बनता जा रहा है। जिले के सरकारी और निजी अस्पतालों में पिछले 22 महीनों के भीतर 190 गर्भवती महिलाओं की इलाज के दौरान मौत हो जाना किसी एक सिस्टम की नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य ढांचे की गंभीर विफलता को उजागर करता है। जिला स्वास्थ्य समिति की फरवरी 2026 की रिपोर्ट इस संकट को और भयावह बनाती है, जिसमें सामने आया है कि अकेले बीएचयू में ही 50 से अधिक महिलाओं की मौत हुई, और इनमें से 44 मौतें महज 10 महीनों के भीतर हो गईं। यह आंकड़ा सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि हर उस परिवार की टूटी उम्मीदों की कहानी है, जो सुरक्षित प्रसव का सपना लेकर अस्पताल पहुंचा था।
गांवों में ज्यादा खतरा, समय पर इलाज की कमी
इस त्रासदी की जड़ें शहर से ज्यादा ग्रामीण इलाकों में गहरी हैं। आराजीलाइन, चिरईगांव और हरहुआ ब्लॉक में कुल मौतों का 56 प्रतिशत होना यह साफ करता है कि गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं अब भी बेहद कमजोर हैं। समय पर अस्पताल न पहुंच पाना और प्राथमिक इलाज में देरी, इन मौतों की बड़ी वजह बन रही है। हर महीने करीब 2000 गर्भवती महिलाओं का इलाज जिले के विभिन्न अस्पतालों, सीएचसी-पीएचसी, जिला महिला अस्पताल और बीएचयू में होता है, लेकिन इसके बावजूद मौतों का यह आंकड़ा बताता है कि इलाज की गुणवत्ता और निगरानी में गंभीर खामियां हैं।
लापरवाही का काला सच
समीक्षा में यह भी सामने आया कि पिंडरा, चोलापुर, बड़ागांव और आराजीलाइन के अस्पतालों में इलाज के दौरान लापरवाही बरती जा रही है। महिलाओं को समय पर और सही इलाज नहीं मिल पा रहा, जिससे उनकी हालत बिगड़ती चली जाती है। यह लापरवाही केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनहीनता का भी उदाहरण है, जहां एक-एक मिनट की देरी किसी की जान ले रही है।
पहला मामला: लालच ने ली एक और जान
चिरईगांव क्षेत्र के बराईं गांव की 20 वर्षीय चांदनी की मौत इस सिस्टम की सबसे कड़वी सच्चाई को सामने लाती है। प्रसव पीड़ा होने पर उसे सरकारी अस्पताल ले जाने के बजाय आशा कार्यकर्ता उसे डुबकियां बाजार में एक रिटायर्ड एएनएम के निजी आवास पर ले गई। वहां अकुशल तरीके से डिलीवरी कराई गई, और कुछ ही देर बाद चांदनी की मौत हो गई। जांच रिपोर्ट में साफ हुआ कि यह सब लालच में किया गया। यह सिर्फ एक मौत नहीं, बल्कि उस भरोसे की हत्या है, जो लोग सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर करते हैं।
दूसरा मामला: इलाज में देरी बनी मौत की वजह
मिर्जामुराद क्षेत्र की 26 वर्षीय विनीता राय का मामला भी उतना ही दर्दनाक है। पेट दर्द की शिकायत पर एक क्लिनिक में भर्ती कराई गई विनीता को दो दिनों तक वहीं रखा गया, लेकिन उसकी हालत में सुधार नहीं हुआ। जब स्थिति बेहद गंभीर हो गई, तब उसे वाराणसी रेफर किया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। परिजनों का आरोप है कि समय पर सही निर्णय लिया जाता तो शायद उसकी जान बचाई जा सकती थी।
विशेषज्ञों की चेतावनी: बढ़ता जोखिम और जटिलताएं
डॉक्टरों के अनुसार इन मौतों के पीछे कई गंभीर चिकित्सीय कारण भी हैं, लेकिन समय पर सही इलाज से इन्हें रोका जा सकता था। जिला महिला अस्पताल की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अल्का सिंह बताती हैं कि अत्यधिक रक्तस्त्राव सबसे बड़ी समस्या बनकर सामने आ रहा है। कई मामलों में गर्भाशय ढीला पड़ जाता है, जिससे स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाती है। वहीं दीनदयाल एमसीएच विंग की डॉ. ज्योति ठाकुर के अनुसार हाई ब्लड प्रेशर, संक्रमण और एनीमिया जैसी समस्याएं भी जोखिम को बढ़ा रही हैं, खासकर उन महिलाओं में जिनकी चौथी या पांचवीं डिलीवरी होती है।
सरकारी दावे और जमीनी हकीकत का टकराव
स्वास्थ्य विभाग के अपर निदेशक डॉ. एनडी शर्मा का कहना है कि मातृ मृत्यु दर कम करने के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं और एएनएम तथा आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को जागरूकता की जिम्मेदारी दी गई है। उनका दावा है कि महिलाओं को शादी के दिन से ही स्वास्थ्य विभाग में पंजीकृत किया जाता है और आशा कार्यकर्ता उन्हें कम उम्र में मां बनने से रोकने की सलाह देती हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब जमीनी स्तर पर ऐसी लापरवाही और अव्यवस्था है, तो ये अभियान आखिर कितने प्रभावी साबित हो रहे हैं।
जवाबदेही का वक्त, नहीं तो हालात और भयावह होंगे
वाराणसी में मातृ मृत्यु के ये आंकड़े सिर्फ एक जिले की समस्या नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य सिस्टम के लिए चेतावनी हैं। अगर समय रहते जवाबदेही तय नहीं हुई और लापरवाही पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो यह संकट और गहराता जाएगा। मातृत्व जैसी संवेदनशील प्रक्रिया को सुरक्षित बनाना सरकार और स्वास्थ्य तंत्र की प्राथमिक जिम्मेदारी है, लेकिन मौजूदा हालात यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या इस जिम्मेदारी को गंभीरता से निभाया जा रहा है या नहीं।