देश-विदेश

‘दुनिया में कितना ग़म है…’: एक बूढ़ी मां की कहानी, जो दिल को चीर देती है

वाराणसी| हिंदी सिनेमा के 1986 के दौर में अभिनेता राजेश खन्ना पर फिल्माया गया गीत ‘दुनिया में कितना ग़म है, मेरा ग़म कितना कम है’ आज भी सुनने वालों की आंखें नम कर देता है। लेकिन जब यही गीत किसी की जिंदगी की सच्चाई बन जाए, तो दर्द शब्दों से कहीं आगे निकल जाता है। वाराणसी के मारवाड़ी अस्पताल के एक बिस्तर पर पड़ी 80 वर्षीय लालमणि की कहानी कुछ ऐसी ही है, जिसे सुनकर किसी का भी दिल पसीज जाए और होंठों पर अनायास यही गीत आ जाए।

टूटता आशियाना और बिखरते रिश्ते
लालमणि कभी वाराणसी के बड़ी गैबी इलाके में अपने परिवार के साथ रहती थीं। पति थे, दो बच्चे थे और एक सामान्य जीवन था। लेकिन वक्त ने करवट ली, पति का निधन हुआ और धीरे-धीरे बच्चों ने भी मां से दूरी बना ली। लालमणि की आंखों में आंसू भर आते हैं जब वह बताती हैं कि मकान बिक गया, बच्चे बड़े होकर अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गए, शादी के बाद कहीं और बस गए और उन्होंने मां से नाता लगभग तोड़ लिया।

चौखट बनी सहारा, भक्ति बनी जिंदगी
जब अपना ही घर पराया हो जाए, तो इंसान ईश्वर की शरण में ही सुकून ढूंढता है। लालमणि का ठिकाना भी फिर लक्सा स्थित खाटू श्याम मंदिर की चौखट बन गया। वहीं बैठकर वह भजन गाने लगीं और प्रभु के ध्यान में लीन रहने लगीं। काशी को अन्नपूर्णा की नगरी कहा जाता है, जहां कोई भूखा नहीं सोता। यही बात लालमणि की जिंदगी में भी सच साबित हुई। उनके खाने-पीने की जिम्मेदारी विमल जैन नाम के एक साड़ी व्यवसायी ने अपने ऊपर ले ली।

मानवता का चेहरा: विमल जैन की सेवा
बुलानाला निवासी विमल जैन और उनकी पत्नी रोजाना लालमणि के लिए भोजन तैयार करते थे। सुबह और शाम वह स्वयं मंदिर की चौखट पर पहुंचकर उन्हें खाना खिलाते थे। लालमणि केलिए यह सेवा किसी संजीवनी से कम नहीं थी। भक्ति और भोजन, दोनों का सहारा उन्हें वहीं मिल रहा था, और उनकी जिंदगी किसी तरह आगे बढ़ रही थी।

एक हादसा और अस्पताल का बिस्तर
लेकिन हाल ही में एक हादसे ने उनकी हालत और बिगाड़ दी। गिरने से उनके पैर और कुल्हे में गंभीर चोटें आईं। विमल जैन उन्हें तुरंत गोदौलिया स्थित मारवाड़ी अस्पताल लेकर पहुंचे और भर्ती कराया। डॉक्टरों ने जांच के बाद स्पष्ट कहा कि उम्र अधिक होने के कारण उनकी स्थिति में सुधार सीमित ही रह सकता है।

सेवा की सीमाएं और नई तलाश
विमल जैन के सामने अब एक बड़ी चुनौती थी। एक ओर उनका व्यापार और परिवार, दूसरी ओर लालमणि की देखभाल। पूरा समय देना उनके लिए संभव नहीं था। ऐसे में उन्होंने लावारिस और असहाय लोगों की सेवा करने वाले समाजसेवी अमन कबीर से संपर्क किया।

मां की आखिरी इच्छा: मंदिर की चौखट
जब अमन कबीर अस्पताल पहुंचे और लालमणि से बातचीत की, तो बूढ़ी मां की एक ही जिद सामने आई। उन्होंने साफ कहा कि उन्हें न अस्पताल में रहना है और न ही किसी आश्रम में जाना है। वह बस लक्सा लौटना चाहती हैं, वहीं खाटू श्याम के दरबार में, जहां उन्होंने अपने जीवन का सहारा पाया। यह सुनकर अस्पताल में मौजूद लोगों की आंखें नम हो गईं।

एक सवाल जो चुभता है
फिलहाल लालमणि अस्पताल के बिस्तर पर हैं, लेकिन उनकी आंखें अब भी उस चौखट को तलाश रही हैं, जहां उन्हें सुकून मिलता था। इस पूरी कहानी के बीच एक सवाल हर किसी के मन में उठता है कि जिस मां ने अपने बच्चों को कर्ज लेकर पाला, बीमारी में उनकी सेवा की, आखिर वही बच्चे बड़े होकर शादी के बाद अपनी मां को इस हालत में अकेला कैसे छोड़ सकते हैं? क्या रिश्तों की गर्माहट अब इतनी ठंडी हो चुकी है?

भक्ति में मुक्ति की आस
लालमणि अब भी खाटू श्याम के बुलावे का इंतजार कर रही हैं। उनकी चाहत है कि वह फिर उसी चौखट पर लौटें, जहां बैठकर वह गा सकें ‘हारे का सहारा, तुम ही श्याम हमारा, तुमसे ही है ये जीवन, तुम ही हो किनारा’। शायद उसी भक्ति में उन्हें अपने जीवन के सारे दुखों से मुक्ति मिल जाए। 
----------