सांकेतिक भाषा से मिला इंसाफ, मूक-बधिर दंपती को संपत्ति में हक
2026-05-11 03:37 PM
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इंदौर| इंदौर और शाजापुर से सामने आया एक मामला अब देशभर में चर्चा में है। पहली बार ऐसा हुआ है जब मूक-बधिर दंपती को सांकेतिक भाषा यानी साइन लैंग्वेज के जरिए न्याय मिला। मामला संपत्ति विवाद से जुड़ा था और लंबे समय से परिवार के भीतर तनाव बना हुआ था। दंपती अपनी बात ठीक से रख नहीं पा रहे थे और इसी वजह से विवाद लगातार बढ़ता जा रहा था। आखिरकार इंदौर के साइन लैंग्वेज एक्सपर्ट ज्ञानेंद्र पुरोहित और अतुल राठौर की मदद ली गई। दोनों एक्सपर्ट्स ने ऑनलाइन माध्यम से दंपती और उनके परिवार के लोगों से बातचीत की। बताया जा रहा है कि यह देश का पहला ऐसा मामला है जिसमें मूक-बधिर दंपती के विवाद का ऑनलाइन साइन लैंग्वेज मीडिएशन किया गया और उसी के आधार पर कोर्ट ने फैसला सुनाया।
प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक दंपती को परिवार की संपत्ति में हिस्सा नहीं दिया जा रहा था। ससुराल पक्ष का रवैया लगातार सख्त बना हुआ था। इतना ही नहीं, उनके घर की बिजली तक काट दी गई थी। दंपती लंबे समय से परेशान थे लेकिन अपनी समस्या को सही तरीके से समझा नहीं पा रहे थे। इसके बाद मामला जिला विधिक सेवा प्राधिकरण तक पहुंचा। यहां से साइन लैंग्वेज एक्सपर्ट्स को जोड़ा गया ताकि दोनों पक्षों के बीच बातचीत हो सके। ऑनलाइन मीडिएशन के दौरान एक्सपर्ट्स ने सांकेतिक भाषा में दंपती की बात समझी और फिर परिवार के लोगों को कानून के प्रावधान बताए। उन्हें समझाया गया कि किसी व्यक्ति के मूक-बधिर होने का मतलब यह नहीं कि उसे संपत्ति के अधिकार से वंचित कर दिया जाए। कानून सभी को बराबरी का अधिकार देता है।
बताया जा रहा है कि मीडिएशन की पहली सुनवाई में दोनों पक्ष काफी आक्रामक थे। परिवार के लोग अपनी बात पर अड़े हुए थे जबकि दंपती लगातार इशारों के जरिए अपनी परेशानी बता रहे थे। साइन लैंग्वेज एक्सपर्ट्स ने बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की। इसके बाद दूसरी ऑनलाइन सुनवाई हुई। इस दौरान संपत्ति और उत्तराधिकार कानून को लेकर विस्तार से जानकारी दी गई। अधिकारियों के अनुसार, बातचीत के बाद ससुराल पक्ष ने अपनी गलती मानी और दंपती को संपत्ति में हिस्सा देने के लिए तैयार हो गया। 18 अप्रैल को आखिरी सुनवाई हुई और उसके बाद पूरी रिपोर्ट शाजापुर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण कोर्ट में पेश की गई। कोर्ट ने रिपोर्ट को अहम आधार माना और दंपती के पक्ष में फैसला दिया। इसके बाद परिवार ने बिजली कनेक्शन भी दोबारा शुरू कर दिया।
इस मामले के सामने आने के बाद न्याय व्यवस्था में सांकेतिक भाषा की जरूरत को लेकर चर्चा तेज हो गई है। लंबे समय से मूक-बधिर लोग कोर्ट और सरकारी दफ्तरों में अपनी बात रखने में परेशानी झेलते रहे हैं। कई मामलों में वे सही तरीके से संवाद नहीं कर पाते, जिसकी वजह से विवाद सालों तक चलते रहते हैं। इंदौर के साइन लैंग्वेज एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसे लोगों को सिर्फ कानूनी नहीं बल्कि संवाद संबंधी मदद की भी जरूरत होती है। यही वजह है कि अब मध्य प्रदेश में इस दिशा में नई पहल शुरू की गई है। मप्र हाई कोर्ट ने मूक-बधिरों से जुड़े मामलों के समाधान के लिए 28 लोगों की स्पेशल टीम बनाई है। इसमें 21 मूक-बधिर और 7 साइन लैंग्वेज एक्सपर्ट शामिल किए गए हैं। खास बात यह है कि टीम में महिलाएं भी शामिल हैं और इन्हें विशेष प्रशिक्षण दिया गया है।
यह टीम पारिवारिक, वैवाहिक और संपत्ति विवादों को कोर्ट के बाहर सुलझाने का काम करेगी। कोशिश यह रहेगी कि मूक-बधिर लोगों को अपनी बात कहने के लिए किसी तरह की परेशानी न हो। बताया जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट से भी इस पहल को मंजूरी मिल चुकी है। अब देश के किसी भी हिस्से से मूक-बधिर लोग इन एक्सपर्ट्स की मदद ले सकेंगे। इंदौर, भोपाल, जबलपुर, रीवा और सीधी में स्पेशल मीडिएशन सेंटर शुरू करने की तैयारी चल रही है। अधिकारियों के अनुसार, इन सेंटरों में साइन लैंग्वेज के माध्यम से सुनवाई और बातचीत की व्यवस्था रहेगी। इससे ऐसे लोगों को काफी राहत मिलने की उम्मीद है।
इसी बीच एक और मूक-बधिर दंपती का मामला इंदौर फैमिली कोर्ट में पहुंचा है। युवक पांढुर्णा का रहने वाला बताया जा रहा है। शादी के बाद से दोनों के बीच विवाद बढ़ने लगे थे और मामला तलाक तक पहुंच गया। कोर्ट में दोनों अपना पक्ष ठीक तरीके से नहीं रख पा रहे थे। इसके बाद साइन लैंग्वेज एक्सपर्ट्स की मदद ली गई। 8 मई को पहली बार मीडिएशन हुआ। बताया जा रहा है कि एक पक्ष अब तलाक नहीं चाहता जबकि दूसरा पक्ष अभी भी असमंजस में है। मामले की अगली सुनवाई 27 जून को होगी।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के मार्गदर्शन में यह पूरी पहल शुरू की गई है। 1 अप्रैल से मीडिएशन का काम शुरू हो चुका है। 16 मई को जबलपुर में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस सूर्यकांत के दौरे के दौरान इन विशेष केंद्रों की औपचारिक शुरुआत भी हो सकती है।