जी-20 शिखर सम्मेलन की सबसे बड़ी नटराज प्रतिमा का निर्माण करने में 30 महीने का कार्य 6 महीने में किया पूरा
नईदिल्ली। नटराज' एक शक्तिशाली प्रतीक है जो एक ही छवि में शिव को ब्रह्मांड के रचियता, संरक्षक और विनाशक के रूप में जोड़ता है और समय के गतिशील चक्र की भारतीय समझ को भी व्यक्त करता है। नटराज की मूर्तिकला कला जगत में चर्चा का विषय बन गई है और आलोचकों ने इसे आधुनिक चमत्कार और कलात्मक उत्कृष्टता का एक स्थायी प्रतीक बताया है।
दुनिया के प्रतिनिधि अपने लिए स्थापति की इस रचना को देखने के लिए उमड़ पड़ी, जो कला के इस प्रसिद्ध कार्य से निकलने वाली सुंदरता और दिव्य ऊर्जा का अनुभव करने के लिए उत्सुक थे। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) ने जी-20 शिखर सम्मेलन स्थल भारत मंडपम में 'नटराज' प्रतिमा की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 'नटराज' पर विचार-विमर्श, चर्चा, प्रवचन करने और ज्ञान को युवा पीढ़ी तक प्रसारित करने के लिए "नटराज: "ब्रह्मांडीय ऊर्जा की अभिव्यक्ति" विषय पर एक संगोष्ठी का डॉ. अम्बेडकर अंतर्राष्ट्रीय केंद्र में आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में इन शानदार कृति नटराज प्रतिमा के निर्माताओं का सम्मान भी किया गया।
डॉ. सोनल मानसिंह ने नए आईटीपीओ कन्वेंशन सेंटर में नटराज की प्रतिमा की स्थापना का जिक्र करते हुए कहा कि "नटराज : ब्रह्मांडीय ऊर्जा की अभिव्यक्ति" विषय पर ध्यानपूर्वक आयोजित इस संगोष्ठी में भाग लेना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। उन्होंने इस ज्ञानवर्धक कार्यक्रम की मेजबानी करने, भारतीय मूल्यों, ज्ञान और हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की सही जानकारी को बढ़ावा देने के लिए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय केन्द्र के प्रति आभार व्यक्त किया।
सभा को संबोधित करते हुए संस्कृति मंत्रालय में सचिव गोविंद मोहन ने 'नटराज' प्रतिमा के निर्माण से संबंधित अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि पूरी प्रक्रिया बहुत चुनौतीपूर्ण थी फिर भी ये 'नटराज' ही थे जो इस विशाल कार्य को पूरा करने में प्रेरणा देते रहे। उन्होंने कहा कि इसका निर्माण पारंपरिक तरीके से किया जाना था और इस प्रकार दुनिया की सबसे ऊंची 'नटराज' की मूर्ति को स्थापति राधा कृष्ण और उनकी टीम, स्वामी मलाई, तमिलनाडु ने पारंपरिक खोई हुई मोम ढलाई प्रक्रिया का उपयोग करके बनाया था। सिल्पा शास्त्र में उल्लिखित सिद्धांतों और मापों का इसमें पालन किया गया है, जिनका चोल काल से, यानी 9वीं शताब्दी ईस्वी के बाद से नटराज के निर्माण में पालन किया जाता है।