रायपुर

दूरस्‍थ क्षेत्रों के आदिवासी पहुंचने लगे हैं अस्‍पताल: डॉ. गोडबोले

- महाराष्‍ट्र मंडल, बृहन्‍महाराष्‍ट्र मंडल ने पद्मश्री डॉ. रामचंद्र का किया सम्‍मान 

रायपुर। दंतेवाडा जिले के बारसुर में जाकर महाराष्‍ट्र मंडल और बृहन्‍महाराष्‍ट्र मंडल के प्रतिनिधियों ने पद्मश्री डॉ. रामचंद्र गोडबोले को सम्‍मानित किया। हाल ही में 26 जनवरी को राष्‍ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने डॉ. गोडबोले और उनकी पत्‍नी डॉ. सुनीता गोडबोले को संयुक्‍त रूप से पद्मश्री देने की घोषणा की थी। करीब 36 वर्षों से बारसुर में आदिवासियों का नि:शुल्क इलाज कर रहे डॉ. गोडबोले ने अनुसार अब आदिवासी इलाज कराने के लिए अस्‍पतालों में स्‍वयं पहुंचने लगे हैं। यह सेहत को लेकर उनकी बढ़ती जागरूकता का प्रमाण है।
 
महाराष्‍ट्र मंडल के पूर्व पदाधिकारी और बृहन्‍महाराष्‍ट्र मंडल नई दिल्‍ली के छत्‍तीसगढ़ प्रभारी सुबोध टोले ने पत्‍नी साक्षी टोले के साथ डॉ. गोडबोले का सूत माला, शाल- श्रीफल और स्‍मृति चिन्‍ह देकर सम्‍मान किया। इस मौके पर डॉ. गोडबोले को जब रायपुर के महाराष्‍ट्र मंडल की जानकारी दी गई तो उन्‍होंने आश्‍चयमिश्रित खुशी व्‍यक्‍त की। उन्‍होंने लगभग पांच हजार सभासदों वाले मंडल की कैलेंडर के माध्यम से हर एक गतिविधियों की जानकारी ली और शुभकामनाएं दीं। डॉ. गोडबोले ने अति‍शीघ्र सपत्‍नीक महाराष्‍ट्र मंडल आने का विश्‍वास भी दिलाया।  
 
डॉ. गोडबोले ने बताया कि उन्‍हें वनवासी कल्‍याण आश्रम की ओर से आदिवासियों की नि:स्‍वार्थ सेवा करने के लिए साल 1990 में बारसुर भेजा गया था। उन्‍हें आश्रम ने वर्ष 2002 से 2010 तक दूसरे सेवाभावी प्रकल्‍प के लिए मुंबई भेजा। वहां से जब वे वनवासी कल्‍याण आश्रम लौटे, तो उन्‍हें भावी सेवा कार्यों के लिए दो विकल्‍प मेघालय या बारसुर लौटने के विकल्‍प दिए गए। डॉ. गोडबोले कहीं भी जाने के लिए तैयार थे। अंतत: उन्‍हें बारसुर में ही वापस भेजा गया।  
डॉ. गोडबोले के अनुसार इस दौरान वे अविवाहित थे लेकिन सवाल ये भी था कि उनसे आखिर शादी करेगा कौन। इस बीच अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की सक्रिय कार्यकर्ता डॉ. सुनीता का मन भी नि:स्‍वार्थ सेवा कार्यों में ही लगा था। समान सोच के कारण दोनों ने विवाह किया और वे आदिवास‍ियों की सेवा में निरंतर लगे हुए हैं। 
 
डॉ. रामचंद्र ने बताया कि पहले आदिवासी इलाज के लिए अस्‍पताल में नहीं आते थे। इसलिए उन्‍हें गांव- गांव जाकर स्‍वास्‍थ्‍य शिविर लगाना पड़ता था। इसमें वे ग्रामीणों का न केवल उपचार करते थे, बल्कि बीमारियों की गंभीरता को लेकर उन्‍हें जागरूक भी करते थे। लगभग साढ़े तीन दशकों के बाद अब स्थिति काफी बेहतर हो गई है। एक सवाल के जवाब में डॉ. गोडबोले ने कहा कि यहां के आदिवासियों में थायरायड की समस्‍या अधिक पाई जाती है। ऐसे में वे बच्‍चों से लेकर अस्‍पताल आने वाले बुजुर्गों को गुड़- चना- मूंगफल्‍ली के लड्डू मुफ्त में बांटते हैं।