अंतरंग में जिनवाणी धारण करने से होता है जीवन का सच्चा निर्माण: मुनिश्री आगम सागर जी महाराज
रायपुर। श्री दिगंबर जैन आदीश्वरधाम नवोदय तीर्थ समयोपदेश वर्षायोग 2026 समिति, सकल दिगंबर जैन समाज रायपुर तथा श्री दिगंबर जैन बड़ा मंदिर (मालवीय रोड) के तत्वावधान में आयोजित 'समयोपदेश वर्षायोग 2026' के अंतर्गत विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रमों का आयोजन अत्यंत आनंदमय व भक्तिमय वातावरण में संपन्न हुआ। आचार्य परंपरा के संवाहक मुनि 108 श्री आगम सागर जी महाराज एवं मुनिश्री ससंघ के पावन सानिध्य में प्रातःकाल मूलनायक भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, पूजन और आहारचर्या का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम के दौरान मुख्य शांतिधारा का सौभाग्य जगदलपुर निवासी श्रेयांश कुमार एवं सुनीता जैन परिवार को प्राप्त हुआ। त्रिकाल चौबीसी में भगवान विराजमान करने वाले पुण्यार्गी परिवार (बंजारी रोड निवासी) सनत कुमार जैन, अनिल कुमार जैन, मनोज कुमार जैन एवं रोमिल जैन (चूड़ीवाला परिवार) ने मूलनायक भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा करने का सौभाग्य अर्जित किया।
मुनि संघ को पावन आहारदान देने का सौभाग्य निम्नलिखित परिवारों को प्राप्त हुआ। जिसमें मुनि 108 श्री आगम सागर जी महाराज: श्रीमती सरोज एवं श्री प्रमोद जी जैन (निज निवास, गणेश राम नगर), मुनि 108 श्री पुनीत सागर जी महाराज: श्रीमती ऊषा एवं श्री धर्मचंद जी गंगवाल (मंदिर जी के सामने), एलक श्री धैर्य सागर जी महाराज: श्री महेंद्र कुमार जी जैन (सप्रे मैदान के सामने, बुढ़ापारा)
आध्यात्मिक शिक्षण की श्रृंखला में मुनि श्री पुनीत सागर जी महाराज ने श्रद्धालुओं को 'तत्त्वार्थ सूत्र' का वाचन एवं गहन अध्ययन कराया। वहीं मुनि श्री आगम सागर जी महाराज ने 'छह ढाला' की कक्षा का अध्यापन कराते हुए प्रेरणादायी मार्गदर्शन प्रदान किया।
अपनी मंगल देशना में मुनि श्री आगम सागर जी महाराज ने धर्म के वास्तविक स्वरूप को स्पष्ट करते हुए कहा कि पूजा मात्र एक क्रिया है, धर्म नहीं। पूजा-पाठ करने से जीव कुछ समय के लिए सांसारिक प्रपंचों से मुक्त होकर भगवान की शरण में जाता है, जिससे मन शांत होता है और भटकने से बचता है। वास्तविक धर्म क्षमा और दया में निहित है। उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि हमें अपने अंतरंग के आठों कर्मों का क्षय करने का प्रयास करना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह संदेश दिया कि जो आचरण या कार्य आपके गुरु नहीं करते, उससे गृहस्थों को भी बचना चाहिए।
"जिनवाणी का अंतर्मन में उतरना अत्यंत दुर्लभ है, परंतु जो भव्य जीव विनयपूर्वक जिनवाणी को अपने जीवन में धारण करते हैं, जिनवाणी जन्म-जन्मांतर तक उनका साथ निभाती है और उनके आगामी भव को उज्ज्वल बनाती है।" उक्त विचार पूज्य मुनि श्री आगम सागर जी महाराज ने अपनी मंगल देशना में व्यक्त किए। मुनि श्री ने स्वाध्याय और विनय की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जिनवाणी को केवल पढ़ना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे विनय के साथ जीवन में उतारने से ही श्रेष्ठ चरित्र और आत्म-निर्माण संभव होता है
जैन दर्शन के आलोक में उदाहरण देते हुए मुनि श्री ने कहा कि भगवान श्री राम ने अपने पूर्व जन्मों में जिनवाणी के अमृत रस का पान किया था, जिसके फलस्वरूप उनकी कषायें (क्रोध, मान, माया, लोभ) अत्यंत मंद हो गई थीं। जो जीव वीतराग वाणी और सिद्धांतों का गहन अध्ययन कर लेते हैं, वे सदैव सन्मार्ग पर चलते हैं और दूसरों को भी सही राह दिखाते हैं। क्रोध, लोभ, मोह और माया जैसी कषायों में उलझा व्यक्ति जीवन में कभी आध्यात्मिक ऊँचाइयों को प्राप्त नहीं कर सकता।
प्रकृति का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रकार गाय साधारण घास-फूस खाकर भी अमृत रूपी मीठा दूध प्रदान करती है, उसी प्रकार एक सम्यग्दृष्टि जीव भी कठिन परिस्थितियों के बीच रहकर समाज को सदैव कल्याणकारी विचार ही देता है।
जैन धर्म के अनुसार रामचंद्र जी अत्यंत योग्य, महापुरुष एवं इस वसुंधरा के 8वें बलभद्र थे। मुनि श्री ने कहा कि इस सृष्टि में भाई-भाई का प्रेम सबसे बड़ा माना गया है, जिसका जीवंत प्रमाण भगवान राम और लक्ष्मण के जीवन में देखने को मिलता है।
कथा का प्रसंग जोड़ते हुए मुनि श्री ने बताया कि राजा दशरथ जब अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में वैराग्य की ओर बढ़ने लगे, तब उन्होंने राम को राज्य सौंपने का विचार किया। वहीं दूसरी ओर, भरत जी बचपन से ही विरक्त भाव रखते थे। जब राम जी द्वारा धनुष भंग (स्वयंवर प्रसंग) हुआ, तो भरत जी के मन में वैराग्य और अधिक प्रबल हो गया। यद्यपि माता-पिता ने उनका विवाह कराया, किंतु जब महाराज दशरथ ने वन जाकर दीक्षा लेने का मन बनाया, तो भरत जी भी पिता के साथ वैराग्य पथ पर अग्रसर होने के लिए तत्पर हो गए। तब माता कैकेयी ने पिता और पुत्र दोनों के अनुरागी मोह में उन्हें रोकने हेतु वह घटनाक्रम रचा।
मुनि श्री ने अंत में कहा कि भगवान राम का हृदय इतना विशाल था कि उन्होंने सदैव 'मेरा या मेरे भाई का' में कोई भेद नहीं समझा। जिनके अंतरंग में यह निर्मल परिणाम बैठ जाता है कि "जो मेरा है, वही मेरे भाई का है", वही विशाल दृष्टि वाला बनकर पूजा जाता है। इसी उदारता के कारण प्रातः काल राम का नाम श्रद्धा से लिया जाता है। माता सीता की विशालता और समर्पण का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सीता जी ने हर परिस्थिति में राम का साथ कभी नहीं छोड़ा। उनके इसी अतुलनीय त्याग और विशाल हृदय के कारण ही लोकजीवन में राम से भी पहले सीता का नाम लिया जाता है और 'सीता-राम' कहकर उनका स्मरण किया जाता है।
आयोजन की अगली कड़ी में दोपहर को मुनि श्री पुनीत सागर जी महाराज के सानिध्य में '3rd Eye' (अंतर्ज्ञान चक्षु) कक्षा का आयोजन किया गया, जिसके उपरांत मुनिश्री ससंघ की दिव्य देशना हुई।
सायंकाल में सकल जैन समाज हेतु भव्य वात्सल्य भोज (स्वरुचि भोज) का आयोजन किया गया। आज के स्वरुचि भोज के पुण्यार्जक माना निवासी श्रीमती प्रज्ञा-माधव जी जैन, श्रीमती प्राची जी, श्री अक्षर जी, श्रीमती प्रीति-मननमय जैन, विवृति, विश्रुती, संस्कृती जैन तथा ग्लोरियस पीस एंड डिवाइन इंग्लिश मीडियम हायर सेकेंडरी स्कूल (धूसेरा एवं कृष्णा नगर, रायपुर) रहे। रात में एलक श्री धैर्यसागर जी महाराज के पावन सानिध्य में 'तत्त्वार्थ सूत्र' की विशेष स्वाध्याय कक्षा आयोजित की गई।