महाराष्ट्र मंडल पहुंच ‘कचरा सेठ’ ने कलाकारों के साथ साझा किए रंगमंच व फिल्मों के अनुभव
2025-05-18 11:00 PM
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रायपुर। नाटकों में हूं इसलिए फिल्मों में भी हूं, ऐसा कहना गलत है। बल्कि मेरे लिए तो नाटकों में काम करना गंगास्नान की तरह है। रंगमंच मेरे लिए प्राण वायु है। सुप्रसिद्ध नाट्य व फिल्म अभिनेता मनोज जोशी ने इस आशय के विचार महाराष्ट्र मंडल के छत्रपति शिवाजी महाराज सभागृह में रंगसाधकों से चर्चा करते हुए व्यक्त किए। इस मौके पर मंडल अध्यक्ष अजय मधुकर काले, छत्तीसगढ़ी फिल्मों के अभिनेता योगेश अग्रवाल, रंजन मोडक ने जोशी का शाल, श्रीफल व स्मृति चिन्ह देकर सम्मान किया।
इस अवसर पर जोशी ने कहा कि रंगमंच का कलाकार फिल्मों में अंतिम क्षण तक सीन को और बेहतर बनाने की दिशा में काम करता है। डबिंग करते समय भी अपनी आवाज के माध्यम से वो सीन को इंप्रोवाइज करता है क्योंकि उस सीन को वो डबिंग के समय महसूस करता है।
गत 36 वर्षों में ‘चाणक्य’ नाटक को 1724 बार मंचित कर चुके मनोज जोशी ने मौलिकता को लेकर पूछ गए सवाल पर कहा कि पहले हम अंग्रेजी फिल्मों की कॉपी करते थे। फिर साउथ की फिल्मों की नकल करने लगे और अब दुकान एक, दुकान दो, दुकान तीन का चलन है। उन्होंने कहा कि फिल्मों में चाहे कॉमेडी वाली भूमिका हो या संवेदनशील, वो पूरे तन- मन से, मस्तिष्क से करते हैं। जैसा निर्देशक चाहते हैं वे अपनी भूमिका को वैसे ही निभाते हैं। पसंद का च्वाइस उनके पास नहीं है। वैसे भी वे स्टार सन तो हैं नहीं।
पहले फिल्मों और अब फिल्मों के साथ ओटीटी के कारण रंगमंच के समक्ष चुनौती पर जोशी कहते हैं कि वो कभी भी नकरात्मक नहीं रहे। उनका मानना है कि नाटकों के लिए दर्शकों को जुटाने के लिए नए सिरे से प्रयास करने की जरूरत होगी। हमें अच्छी कहानी के साथ सातत्य का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। कभी भी शुरुआत दो- चार से होती है, जो धीरे- धीरे लोग बढ़ते जाते हैं। बढ़िया निर्देशक के साथ अच्छे नाटक में काम करने के परिणाम मिलेंगे। इसके लिए चाहे तो अच्छे निर्देशक महाराष्ट्र या कहीं और से भी बुलवा सकते हैं। वैसे भी दर्शक आतुर होता है, उसे बस आकर्षित करने की जरूरत है।
एक सवाल के जवाब में मनोज जोशी ने कहा कि पहलगाम हमले और उसके बाद ऑपरेशन सिंदूर को लेकर बॉलीवुड के दिग्गज सितारों के मौन से क्या फर्क पड़ता है। जब पूरा देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ है, अपनी सेना के साथ है। हमारा अपनी तीनों थल, जल, वायु सेना को नमन है। उन्होंने हमारा गौरव बढ़ाया है और बताया है कि कोई हमें छेडे़गा तो हम उसे छोडे़ंगे नहीं। घर में घुसकर मारेंगे।
जोशी ने चाणक्य नाटक के माध्यम से देश के इतिहास को बेहद गरिमामय तरीके से बताया। उन्होंने चाणक्य की कौटिल्य नीति पर चर्चा की और कहा कि चाणक्य की नीति भी यही कहती है कि सीमाओं को मजबूत कर हम देश को सुरक्षित कर सकते हैं। साल 2014 से पहले कब देश की सेना के लिए इतने हथियार खरीदे गए थे। सेना पर कब इतना ध्यान दिया गया था।
गर्व है अपने धर्म पर...
जोशी ने कहा कि समय के साथ फिल्मों को लेकर दर्शकों की अभिरुचि भी बदल रही है। अब कश्मीर फाइल, ताशकंद फाइल, आटिर्कल 370, केरल स्टोरी जैसी फिल्में बन रहीं हैं और देखी भी जा रही हैं। उन्होंने कहा कि धर्म का आशय धारण करना है। धर्म हमें समाज से पकड़कर रखता है, अपने मूल से जोड़कर रखता है। हम तो ऐसे धर्म को मानते हैं, जहां विश्व के कल्याण की बात कही जाती है। यह सौभाग्य है कि हम इस धर्म है, जहां संकट पर, विपत्ति पर, ग्रुपिज्म पर हम विचलति नहीं होते। कार्यक्रम के समापन पर योगेश अग्रवाल का मंडल के मुख्य समन्वयक श्याम संदर खंगन व वरिष्ठ रंग साधक रंजन मोडक ने अभिनंदन किया।