ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानता से ज्ञान की ओर ले जाने वाला ही सच्चा गुरुः आस्था काले
रायपुर। गुरु शब्द में ही गुरू की विशेशता छिपी है। गु का अर्थ अंधकार या अज्ञानता और रू का अर्थ प्रकाश से है। अर्थात जो हमें अंधकार या अज्ञानता से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाए सच्चे अर्थों में वो ही गुरू है। कबीर दास ने कहा है कि पूरी पृथ्वी का कागज, मन को लेखनी और समुद्र को शाही बना ले तो भी गुरू शब्द की व्याख्या नहीं की जा सकती। गुरू की महिमा बहुत बड़ी। उक्ताशय के विचार महाराष्ट्र मंडल के आध्यात्मिक समिति की समन्वयक आस्था कालने गुरू पुर्णिमा के अवसर पर कहीं।
आस्था ने बताया कि कि आज 10 जुलाई को हम गुरू पुर्णिमा मना रहे है। इस दिन महर्षि वेद व्यास का जन्मोत्सव मनाया जाता है। आषाढ़ी पुर्णिमा तिथि वेद व्यास को ही समर्पित है, वेद व्यास ही महाभारत के रचयिता है और चार वेदों की रचनाकार है। उन्हें ही संसार का पहला गुरू माना गया है।
आस्था ने आगे कहा कि कबीरदास ने कहा है “गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पांय, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय” जिसका अर्थ है कि "अगर गुरु और गोविंद (भगवान) दोनों एक साथ खड़े हों, तो पहले गुरु के चरणों में प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि गुरु ने ही गोविंद (भगवान) तक पहुंचने का मार्ग बताया है।" इस दोहे में, कबीर दास जी गुरु की महिमा का वर्णन कर रहे हैं। उनका कहना है कि गुरु का स्थान भगवान से भी ऊपर है, क्योंकि गुरु ही हमें भगवान तक पहुंचने का मार्ग दिखाते हैं।