दिव्य महाराष्ट्र मंडल

रामदास जोगलेकर.... एक नाम जुनून का

रामदास यशवंत जोगलेकर..... एक नाम जुनून और कुछ कर गुजरने की जिद का, रामदास...... एक नाम ईमानदारी और कर्तव्‍यनिष्‍ठा का, रामदास यानी विकास जोगलेकर एक नाम सर्व समभाव और समर्पित समाजसेवी का भी। महाराष्ट्र मंडल सहित बाल समाज बूढ़ापारा, गजानन मंदिर तात्यापारा, चौबे कॉलोनी ट्रस्ट, भगिनी मंडल चौबे कॉलोनी से रामदास जी के घनिष्ठ संबंध हम सभी को पता है। उन्होंने कभी भी इन संस्थाओं से व्यावसायिक संबंध नहीं बनाए, बल्कि जब भी इन संस्‍थाओं को उनकी सेवाओं की आवश्‍यकता होती, वे एक बुलावे पर हाजिर हो जाते, बिल्‍कुल नि:शुल्‍क योगदान देने के लिए। न केवल ये संस्‍थाएं बल्कि ऐसी और भी कई संस्‍थाओं और संगठनों की विकास यात्रा में हमारे ‘भाई’ विकास के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज जो ये संस्थाएं सतत् प्रगति कर रहीं हैं, उनमें विकास भैया के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। 
 
भाई ने तात्‍यापारा स्थित जानकी देवी मराठी शाला में स्कूली शिक्षा ग्रहण की। कई दशकों से उस स्‍कूल को कुसुम ताई दाबके स्कूल के नाम से जाना जाता है। दाबके स्‍कूल के लिए किए गए उनके कार्य बहुत महत्वपूर्ण साबित हुए हैं। रामदास भाई की दिली इच्‍छा थी कि कुसुम ताई दाबके स्‍कूल का संचालन महाराष्ट्र मंडल करे, ताकि जिस स्कूल से वे भावनात्‍मक रूप से जुड़े थे, उसे वे महाराष्‍ट्र मंडल के संत ज्ञानेश्‍वर स्‍कूल की तरह आगे बढ़ते हुए देख सकें। काश..... उनकी यह इच्छा पूरी हो पाती, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।
 
चार्टर्ड एकाउंटेंट (सीए) एसोसिएशन में उन्‍होंने नए विद्यार्थियों को समय- समय पर मार्गदर्शन दिया और अपने आत्‍मीय व्‍यवहार से उन्‍हें अपना सा बना लिया। असल में यही व्‍यवहार रामदास भाई के व्‍यक्तित्‍व की पहचान भी थी। भाई ने जब सीए बनने की ठानी थी, तब उन्होंने गणित विषय के लिए अलग से मेहनत की थी। तात्यापारा में उनका मकान तीन बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए कम पड़ने लगा, तो सुधीर मि्श्रा जी के मकान में काफी समय तक उनका अध्ययन चलते रहा। उन्हें इस बात की अच्छे से जानकारी थी कि निर्धन से उच्च वर्ग में जाने के बाद भी अपने से छोटी उम्र, कम आय वालों के साथ भी वैसा ही व्यवहार करो कि उन्हें अपनापन लगे। रामदास भाई के व्‍यक्तित्‍व की यह दूसरी महत्‍वपूर्ण विशेषता थी। उनके व्‍यक्तित्‍व की तीसरी बड़ी विशेषता दिखावा न करके ‘सिंपल लिविंग हाई थिंकिंग’ विचार को जीवन भर चरितार्थ करते रहने की थी। शिवाजी पर उनका अध्ययन अतुलनीय था। दरअसल रामदास जोगलेकर पुस्तकों में डूबा हुआ एक ऐसा इंसान था, जो दूसरों को भी हमेशा अध्‍ययनशील बने रहने की प्रेरणा देता था। किसी भी विषय को सभी के सामने कैसे प्रस्तुत करना है, ये उनसे सीखा जा सकता था। क्रिकेट का ज्ञान हो, या नाटय क्षेत्र में उनकी जानकारी और समझ, वाकई अद्भुत और प्रशंसनीय थी। 
 
रामनवमी हो या हनुमान जयंती, तात्यापारा हनुमान मंदिर में उनकी अनुपस्थिति संभव ही नहीं थी। घर पर विकास भैया रविवार को अपने पसंद की सब्‍जी खुद खरीदते, बनाते और सभी को खिलाते भी। परिजनों समेत अपने करीबियों को सुस्‍वाद भोजन खिलाकर भी रामदास भाई उनके दिलों में राज करते थे। कोई भी व्यक्ति कितना भी अच्छा, मिलनसार, मृदभाषी, समाजसेवी क्यों न हो, उसका आंकलन का करने का एक पैमाना उसकी अंतिम यात्रा को भी माना जाता रहा है। विकास भाई की अंतिम यात्रा में जुटी सैकड़ों लोगों की भीड़ ने भी उनकी आत्मीयता, भल मनसाहत, विश्‍वसनीयता और ख्‍याति को हमेशा- हमेशा के लिए प्रतिष्ठित कर दिया। आज एक बार फिर भाई को विनम्र आदरांजलि.......  

लेखकः रविंद्र कृष्ण ठेंगड़ी, महाराष्ट्र मंडल, रायपुर