‘जिंदगी कोई नाटक नहीं जिसकी लाइन हिसाब-किताब से बोली जाए’
- हिंदी नाटक टीस में दिखी रंगमंचीय कलाकार के परदे के पीछे की पीड़ा
- हिंदी रंगमंच दिवस पर महाराष्ट्र मंडल और रंगभूमि की प्रस्तुति
रायपुर। रंगमंच की दुनिया में मंच पर खड़ा कलाकार जहां दुनिया का मनोरंजन करता हैं, वहीं उस मंचीय नाट्य अभिनय के लिए परदे के पीछे की कहानी कुछ और ही होती है। इन कलाकारों के दैनिक जीवन के संघर्ष को मंच पर प्रस्तुत करने का काम किया हिंदी नाटक टीस ने। जिसमें यह दर्शाया गया कि जिंदगी कोई नाटक नहीं होती, कि वहां हर बात पहले से हिसाब-किताब करके बोले। बतादें कि हिंदी रंगमंच के दिवस पर महाराष्ट्र मंडल रायपुर और रंगभूमि के कलाकारों द्वारा स्व. डा. कुंज बिहारी शर्मा की जन्मतिथि को पुण्य स्मरण करते हुए महाराष्ट्र मंडल के संत ज्ञानेश्वर सभागृह में हिंदी नाटक टीस का मंचन किया गया।

नाटक “टीस” एक रंगमंच कलाकार के जीवन के संघर्षों को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है। यह दर्शाता है कि एक कलाकार का जीवन केवल तालियों और प्रशंसा तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसके पीछे अनेक त्याग, संघर्ष और मानसिक द्वंद्व छिपे होते हैं। एक ओर उसके भीतर कला के प्रति जुनून और सपनों की आकांक्षा होती है, तो दूसरी ओर पारिवारिक जिम्मेदारियों और अपेक्षाओं का बोझ उसे भीतर ही भीतर तोड़ता रहता है।

नाटक के मुख्य पात्र रजत (आकाश वरठी) एक उत्कृष्ट रंगमंच अभिनेता हैं, जो अपनी कला की दुनिया में खोए रहते हैं, किंतु अपने ही घर में निरंतर संघर्ष करते दिखाई देते हैं। उनकी पत्नी मीना (ट्विंकल परमार) के संवादों में घर की आर्थिक स्थिति और जीवन की कठोर सच्चाइयाँ सामने आती हैं। बाबूजी (प्रांजल सिंह राजपूत) का संवेदनशील दृष्टिकोण यह दर्शाता है कि कलाकारों के भीतर चल रहे भावनात्मक संघर्ष को समझना कितना आवश्यक है। वहीं बलवंत (प्रभात साहू) के संवाद समाज की उस सोच को उजागर करते हैं, जहाँ घर की प्रतिभा को अक्सर पहचान नहीं मिलती।

नाटक में एक अत्यंत भावुक प्रसंग लेखक की पत्नी रंजना ध्रुव द्वारा प्रस्तुत किया गया, जिसमें यह बताया गया कि इस नाटक की प्रेरणा उनके दिवंगत पुत्र के अधूरे सपनों से जुड़ी है। इस पृष्ठभूमि ने नाटक को और अधिक संवेदनशील एवं प्रभावशाली बना दिया। निर्देशक की भूमिका में चंचल ध्रुव को कलाकारों का कुशल मार्गदर्शन करते हुए एक निर्देशक के संघर्ष को बखूबी प्रस्तुत किया गया है। नाटक के संवाद और प्रस्तुति ने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया।
कार्यक्रम में स्व. कुंज बिहारी शर्मा की जन्मतिथि पर पुण्य स्मरण करते हुए पत्रिका रंगकुंज का विमोचन ख्याति लब्द नाट्य लेखक अख्तर अली, वरिष्ठ कवि सुधीर कुमार सोनी, वरिष्ठ कला समीक्षक राजेश गनोदवाले, महाराष्ट्र मंडल के अध्यक्ष अजय मधुकर काले, स्व, कुंज बिहारी शर्मा की पत्नी ममता शर्मा व उनके परिजनों द्वारा किया गया।
कार्यक्रम के पूर्व रंग में प्रस्तुत कविताएँ, “शबरी” तथा “एक पल्ला पुरुष और दूसरा पल्ला स्त्री” के साथ डॉ. विकास अग्रवाल, भूपेंद्र साहू एवं अक्षदा मातुरकर के उत्कृष्ट अभिनय ने समां बाँध दिया। इस प्रस्तुति की परिकल्पना आचार्य रंजन मोड़क द्वारा की गई तथा निर्देशन लोकेश साहू ने किया। मंच संचालन चैतन्य मोड़क ने किया। प्रकाश व्यवस्था नीरज सिंह ठाकुर, संगीत नितीश यादव, रूप सज्जा सुषमा गायकवाड़, वेशभूषा सुमन त्यागी तथा मंच सज्जा अजय पोद्दार , प्रवीण क्षीरसागर द्वारा की गई। मंच व्यवस्था में जयप्रकाश साहू, सुकृत गनोदवाले, रिया परमार, राजेश गनोदवाले, सुमित मोडक और क्षितिज महोबिया का महत्वपूर्ण योगदान रहा।