ज्ञानियों के ज्ञान की प्रशंसा करने से अपने ज्ञान में वृद्धि होती है:- मुनि 108 आगम सागर जी महाराज
2026-08-12 04:02 PM
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रायपुर। दिगंबर जैन बड़ा मंदिर, मालवीय रोड में आयोजित श्री दिगंबर जैन आदीश्वरधाम नवोदय तीर्थ समयोपदेश वर्षायोग 2026 के पावन सानिध्य में आज बुधवार, 12 अगस्त को प्रातःकालीन अभिषेक, शांतिधारा, पूजन, धार्मिक कक्षा एवं आहारचर्या के भव्य धार्मिक अनुष्ठान पूरी श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ संपन्न हुए। इस आशय की विस्तृत जानकारी समिति के अध्यक्ष नरेंद्र जैन गुरुकृपा एवं कार्यकारी अध्यक्ष संजय नायक जैन ने दी। आज प्रातः 8 बजे श्री चंद्र प्रभु जिनालय गुढ़ियारी से पधारे जैन समाज के सदस्यों की विशेष उपस्थिति में जिनालय के मूलनायक भगवान के समक्ष अभिषेक और शांतिधारा का पावन अनुष्ठान संपन्न हुआ। इस दौरान जिनेंद्र भगवान की शांतिधारा करने का परम सौभाग्य श्रीमती शिमली, सौरभ जी शास्त्री, विशाल जैन परिवार (गुढ़ियारी) तथा श्री दीपक, अंशुल, हितेशी, विदेही जी जैन परिवार (बीना वाले, गुढ़ियारी) को संयुक्त रूप से प्राप्त हुआ। उपस्थित श्रद्धालुओं ने मंत्रोच्चार के बीच भगवान का अभिषेक कर विश्व शांति की कामना की।
श्री जी का अभिषेक और शांतिधारा के उपरांत जैन मुनियों एवं एलक जी महाराज की अगवानी करते हुए श्रद्धालुओं ने हर्षोल्लास के साथ नवधाभक्ति की और विधि-विधान से आहारचर्या संपन्न कराई। आज के इस पुण्यार्जन अवसर पर विभिन्न परिवारों को संतों को आहार देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ मुनि 108 श्री आगम सागर जी महाराज को आहार देने का परम सौभाग्य श्रीमती सपना संजय जैन (CSEB निज निवास, लालगंगा विहार, राम कुंड) के परिवार को प्राप्त हुआ। मुनि 108 श्री पुनीत सागर जी महाराज को आहार देने का सौभाग्य श्री पवन सेठी डीडी नगर परिवार को प्राप्त हुआ। एलक 105 श्री धैर्य सागर जी महाराज को आहार देने का सौभाग्य श्रीमती पुष्पा बंशी लाल जैन को प्राप्त हुआ। एलक 105 श्री स्वागत सागर जी महाराज को आहार देने का सौभाग्य श्री राजकुमार जैन एवं श्री संस्कार जैन (झाबक बाड़ा, भाटापारा परिवार) को प्राप्त हुआ।
आज प्रातः मुनि 108 श्री आगम सागर जी महाराज के पावन सानिध्य में धार्मिक कक्षा का आयोजन किया गया, जिसमें श्रद्धालुओं को तत्त्वार्थ सूत्र एवं छह ढाला ग्रंथों का गहन अध्ययन करवाया गया।
अपनी दिव्य मंगल देशना प्रवचन में महाराज श्री ने बताया कि जब हम किसी ज्ञानी के ज्ञान की प्रशंसा करते हैं, तो उससे हमारे अपने ज्ञान में भी वृद्धि होती है। सज्जन पुरुषों का मुख्य कर्तव्य ज्ञानियों की कीर्ति को फैलाना है। जो लोग ज्ञानियों के यश को संपूर्ण जगत में प्रसारित करते हैं, उन्हें आगामी जीवन में मधुर वाणी और वाणी का विशेष सामर्थ्य प्राप्त होता है।
उन्होंने पेट की भूख और संयम का सुंदर दृष्टांत देते हुए समझाया कि जब किसी व्यक्ति को अत्यंत तीव्र भूख लगती है, तब वह भक्ष्य और अभक्ष्य का विचार नहीं कर पाता। पेट की यह अग्नि मनुष्य को बहुत कुछ सिखाती है। जिन्होंने पेट की इस आंतरिक अग्नि को संयम के माध्यम से जीत लिया है, वे अपने भीतर के काम-विकार को भी जीतकर 'जिनेन्द्र' और पूजनीय बन जाते हैं। ऐसे महापुरुषों के दर्शन करने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं।
संसार में केवल धन की पूजा नहीं होती, बल्कि चरित्र की भी पूजा की जाती है। अच्छा व्यवहार, संस्कारवान होना और मृदुभाषी स्वभाव सदा वंदनीय होता है। किसी भी व्यक्ति के चरित्र और उसके व्यक्तित्व का परिचय उसके बोलने के ढंग से ही मिलता है।
आगम ग्रंथों का हवाला देते हुए महाराज श्री ने बताया कि वनवास काल के दौरान लक्ष्मण जी ने कुटिया बनाई और मिट्टी के बर्तन तैयार किए। इसके बाद जब सीता जी ने आहार सामग्री तैयार की और दो मुनिराजों का कुटिया में आगमन हुआ, तब आहारचर्या प्रारंभ हुई। उस समय लक्ष्मण जी वन में रहने के बाद भी कुटिया के बाहर चले गए। राम और सीता जी ने तो मुनि महाराज को अत्यंत भक्ति भाव से आहार कराया, किंतु लक्ष्मण जी उस समय उपस्थित न होने के कारण आहार नहीं दे पाए। इससे यह स्पष्ट होता है कि मुनियों को आहार देना हर किसी के भाग्य में नहीं होता। कभी-कभी घर में चौके लगने के बावजूद घर के सदस्य किन्हीं कर्मोंवश आहार नहीं दे पाते। जिन जीवों को नर्क गति में जाना होता है, उनके ऐसे अकुशल योग बनते हैं कि उन्हें मुनियों को आहार देने का परम सौभाग्य प्राप्त नहीं होता।
चार प्रकार के सर्वोत्तम दान
प्रवचन के अंत में जैन धर्म में वर्णित चार प्रकार के दानों—आहार दान, औषध दान, ज्ञान दान और अभय दान—को सर्वोत्तम माना गया। महाराज श्री ने बताया कि एक धर्मात्मा पुरुष की वाणी मनुष्य के मन, वचन और काया को पूरी तरह से निर्मल बना देती है।