जीवन अनमोल है, बात कीजिए, साथ दीजिएः डॉ. मंजिरी बक्षी
रायपुर। हम सभी के जीवन में ऐसे दिन आते हैं जब हम थका हुआ महसूस करते हैं। कभी काम का प्रेशर होता है, कभी रिश्तों की परेशानियां, कभी पैसे की चिंता, और कभी अपनी उम्मीदों पर खरा न उतर पाने का दर्द। ज़्यादातर लोग धीरे-धीरे इन हालात से उबर जाते हैं, लेकिन कुछ लोग अपने दर्द को इतनी गहराई से दबा लेते हैं कि ज़िंदगी मुश्किल हो जाती है। जब सुसाइड रोकने की बात आती है, तो हमें सिर्फ़ समस्या पर नहीं, बल्कि उस व्यक्ति पर ध्यान देना चाहिए। उक्ताशय के विचार हैप्पीनेस और रिलेशनशिप कोच और महाराष्ट्र मंडल के परिवार परामर्श समिति की महिला प्रभारी डॉ. मंजिरी बक्षी ने कहीं।
विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि कभी-कभी हमें लगता है कि वह व्यक्ति बस परेशान है और कुछ दिनों में ठीक हो जाएगा। लेकिन अगर कोई लगातार चुप रहता है, लोगों से दूर रहता है, अपने भविष्य को लेकर निराशा दिखाता है, या कहता है कि वह अब और नहीं झेल सकता, तो उसे गंभीरता से लेना चाहिए।
उस समय, “इतनी चिंता मत करो,” “सब ठीक हो जाएगा,” या “तुम्हारे पास सब कुछ है” जैसी बातें कहना शायद काम न आए। इसके बजाय, उनके साथ बैठना, ध्यान से सुनना, और यह कहना, “मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम मुझसे बात कर सकते हो” बहुत ज़रूरी हो सकता है।
हमें यह भी समझना होगा कि मेंटल परेशानी के लिए मदद लेना बिल्कुल नॉर्मल है। जैसे हम फिजिकल बीमारी के लिए डॉक्टर से सलाह लेते हैं, वैसे ही मेंटल स्ट्रेस के लिए मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल की मदद लेना भी समझदारी है।
और जो कोई भी मुश्किल समय से गुज़र रहा है, उसके लिए मेरा बस एक ही मैसेज है: प्लीज़ अपना दर्द अकेले न सहें। किसी ऐसे व्यक्ति से बात करें जिस पर आप भरोसा करते हों, और ज़रूरत पड़ने पर एक्सपर्ट की मदद लें।
बातचीत से उम्मीद जग सकती है, एक संवेदनशील कान किसी का दर्द कम कर सकता है, और समय पर मदद किसी की जान बचा सकती है।
इस सुसाइड प्रिवेंशन डे पर, आइए वादा करें
हम सुनेंगे, समझेंगे, सपोर्ट करेंगे, और ज़िंदगी के लिए उम्मीद जगाएंगे।