जेन जी रील्स और इंटरनेट तक सीमित नहीं.... इनोवेशन और स्टार्टअप का आधार भी
रायपुर। जेन जी को हम केवल सोशल मीडिया, रील्स और इंटरनेट की पीढ़ी कहकर सीमित नहीं कर सकते। यही पीढ़ी नई तकनीक सीख रही है, नए स्टार्टअप बना रही है, देश के लिए नए अवसर पैदा कर रही है और वैश्विक मंच पर भारत का नाम रोशन कर रही है। उक्ताशय के विचार महाराष्ट्र मंडल की आजीवन सभासद शताब्दी पांडे ने मंडल में आयोजित नागरिक संवाद में जेन जी और संस्कार विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहीं।
शताब्दी पांडे ने आगे कहा कि आज हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जिसे जेन जी की पीढ़ी कहा जाता है। यह वह पीढ़ी है जो तकनीक के साथ बड़ी हुई है। जिसके हाथ में मोबाइल है, दुनिया उसकी हथेली पर है। सूचना की गति इतनी तेज है कि आज का युवा कुछ ही सेकंड में दुनिया के किसी भी कोने की जानकारी प्राप्त कर सकता है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या तकनीक की गति के साथ हमारे संस्कार भी आगे बढ़ रहे हैं? मेरे विचार से इसका उत्तर है—हाँ, बिल्कुल बढ़ सकते हैं। क्योंकि संस्कार का अर्थ पुराना होना नहीं है।
शताब्दी पांडे ने आगे कहा कि संस्कार का अर्थ है—समय चाहे कितना भी बदल जाए, हमारे भीतर मनुष्यता बनी रहे। लेकिन इस आधुनिकता के साथ हमें कुछ मूल बातें नहीं छोड़नी है। जैसे माता-पिता के प्रति सम्मान, गुरु के प्रति श्रद्धा, प्रकृति के प्रति संवेदना, समाज के प्रति उत्तरदायित्व और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य।
हमारे यहाँ कहा गया है, “मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव।” आज जेन जी को इन शब्दों का अर्थ नए तरीके से समझाने की आवश्यकता है। उन्हें यह नहीं कहना है कि मोबाइल छोड़ दो, बल्कि यह सिखाना है कि मोबाइल आपका साधन बने, आपका स्वामी नहीं। उन्हें यह नहीं कहना है कि आधुनिक मत बनो, बल्कि यह कहना है कि आधुनिक बनो, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़े रहो। क्योंकि जिस वृक्ष की शाखाएँ आकाश को छूती हैं, उसकी जड़ें धरती में उतनी ही गहरी होती हैं। आज आवश्यकता है जेन जी को संस्कारों से जोड़ने की नहीं, बल्कि संस्कारों को जेन जी की भाषा में पहुंचाने की।