नर यानी मुझे यह चाहिए और नारायण यानी मुझे कुछ नहीं चाहिएः नीताताई पुल्लीवार
रायपुर। तात्यापारा स्थित हनुमान मंदिर में चल रही भागवत कथा के तीसरे दिन कथावाचक और कीर्तनकार ह.भ.प. नीताताई पुल्लीवार ने भक्तों को नर और नारायण की कथा सुनाई। उन्होंने नर और नारायण में फर्क बताते हुए कहा कि नर यानी मुझे यह चाहिए और नारायण यानी मुझे कुछ नहीं चाहिए। बतादें कि तात्यापारा स्थित हनुमान मंदिर में भजनानंद समूह एवं मंदिर समिति के संयुक्त तत्वाधान में श्रीमद् भागवत कथा चल रही है। कथा के तीसरे दिन भगवान को 56 भोग भी लगाया गया। इस अवसर पर साधना राहटगांवकर ने सुंदर भजन प्रस्तुत किया।
कीर्तनकार ह.भ.प. नीताताई पुल्लीवार ने कथा श्रवण कराते हुए कहा कि संत एकनाथ ज्ञान के अवतार है। संतों के जैसे शांत रहने और ध्यान करना जीवन में बेहद जरूरी है। हम मृत्यु लोक में रहते है। हमें कभी भी मृत्यु आ सकती है। जो इसे समझ जाता है वह शांत रहता है, ध्यान में रहता है। जीवन में सुखी रहता है।

नीताताई ने कहा कि लक्ष्मी यानी आनंद, निर्मलता और शांतता। इसलिए हमें सदा प्रसन्न रहना चाहिए, तो ईश्वर भी हमसे प्रसन्न रहेंगे। उन्होंने कहा कि दृष्टि बदलने की ताकत अध्यात्म में है, यह सुष्टि हम नहीं बदल सकते तो हमें दृष्टि बदलनी चाहिए। यब हमें सर्फ संत ही सीखा सकते है। यही मन प्रसन्न करने का मार्ग।
नीताताई ने कथा श्रवण कराते हुए आगे कहा कि द्रव्य (पैसा) हम तीन मार्ग से ही खर्च कर सकते है , दान भोग और विनाश। हमारी गलतियां ही हमारी बीमारी के रूप में सामने आती है। किसी चीज की वासना या इच्छा से ही पुनर्जन्म होता है। भक्ति मार्ग में चलकर इस वासना से मुक्ति मिल जाएगी। और यही मोक्ष का मार्ग है।