महाराष्ट्र मंडल गणेशोत्सव में 24 सितंबर को विट्ठल तो आला-आला और चोर आले पाहिजेत का मंचन
रायपुर। महाराष्ट्र मंडळ में रविवार 24 सितंबर को शाम 7.30 बजे से दो मराठी नाटकों का मंचन किया जाएगा। शहीद मेजर यशवंत गोरे स्मृति गणेशोत्सव में मंचित किए जाने वाले दोनों ही नाटकों का निर्देशन महाराष्ट्र नाट्य मंडळ के निर्देशक प्रा. अनिल श्रीराम काळेले ने किया है।
नाट्य मंडळ की अध्यक्ष अभया जोगळेकर ने बताया कि डा. वसंत सबनिस लिखित एकांकिका चोर आलेत पाहिजेत एक दिग्भ्रमित और कुछ हद तक विक्षिप्त युवक की कहानी है, जो शादी के समय मिले ढाई हजार रुपये तोले वाले 10 तोला सोने का बीमा सिर्फ इसलिए करवाता है कि वह चोरी हो जाए, ताकि बीमा कंपनी उसे सोने की वर्तमान बाजार दर के हिसाब से भुगतान करें। इस मनोरंजक नाटक में सुधांशु नाफडे, गौरी क्षीरसागर, भगिरथ काळेले, अभिषेक बक्षी और परितोष डोंनगांवकर ने अभिनय किया है। कला संयोजन अजय पोतदार, वेशभूषा अपर्णा काळेले, मेकअप वंदना निमोणकर और पाश्व संगीत की जिम्मेदारी नवीन देशमुख पूरी की।
अभया जोगळेकर के अनुसार पु.ल.देशपांडे लिखित सुप्रसिद्ध एकांकिका विट्ठल तो आला-आला का महाराष्ट्र मंडळ में रोचक अंदाज में मंचन किया जाएगा। नाटक में विट्ठल की भूमिका में भगिरथ काळेले आकर्षण का केंद्र होंगे। तो वहीं प्रसन्न निमोणकर (सेठजी), चेतन दंडवते (पंडितजी), प्रिया बक्षी (वकील), सुधाशु नाफडे (पशु चिकित्सक), अभिषेक बक्षी (मास्टर), प्रेम उपवंशी (दर्जी), कीर्ति हिशीकर (गायिका), पवन ओगले (अंधा भिखारी), नवीन देशमुख (फिल्म डायरेक्टर), रविंद्र ठेंगड़ी (म्यूजिक डायरेक्टर) की अहम भूमिकाएं है। लगभग एक घंटे का यह नाटक आध्यात्म के साथ वर्तमान परिस्थितियों को मनोरंजक अंदाज में कुरेदता हुआ दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करेगा।
ऐतिहासिक है विट्ठल तो आला आला
अनिल काळेले ने बताया कि लगभग 75 साल पहले पुरुषोत्तम लक्ष्मण देशपांडे द्वारा लिखित नाटक विट्ठल तो आला आला देश में सर्वाधिक मंचित किए जाने वाले नाटकों में से एक है। भारत देश की लगभग सभी भाषाओं में अनुवादित इस नाटक को हर विचारधारा की नाट्य संस्थाएं निःसंकोच मंच पर साकार करती है। महाराष्ट्र मंड़ळ में सन् 1954 में इस नाटक का मंचन जब किया गया था, तब महाराष्ट्र नाट्य मंडल का गठन तक नहीं हुआ था। 1954 में खेले गए इस नाटक का निर्देशन श्रीराम पुरषोत्तम काळेले ने किया था। इसमें यशवंत जोगळेकर, प्रो. कालिया सर, सौ. करकरे, आबा करकरे, इंदु ताई काळेले की भूमिका भी अहम थी। इप्टा के महासचिव अरूण काठोटे के अनुसार 90 के दशक में यही नाटक गांधी मैदान स्थित रंग मंदिर में इप्टा की ओर से मंचित किया गया था। इप्टा रायगढ़ ने भी महाराष्ट्र मंडळ रायपुर में इसका सफल मंचन किया।