दिव्य महाराष्ट्र मंडल

अयोध्या में देखते ही देखते ढह गया पहला, फिर दूसरा और तीसरा गुंबद.... प्रत्यक्षदर्शी मदन दत्तात्रय होनप की ज़ुबानी विवादित ढांचा ढहाने की कहानी

बात उन दिनों की है, जब मेरी मित्र मंडली पूरी दक्षता के साथ  अपना कैरियर बनाने में जुटी थीं। मैं 12वीं कक्षा में विज्ञान का छात्र था। इस दौरान संघ की शाखा में जाना और शाखा लगाना मेरा रोज का काम था। इस दौर में श्रीराम मंदिर पर बहुत चर्चाएं होती थी, तो मुझे भी लगा कारसेवा करनी है और इसके लिए अयोध्या जाना है। ऐसा पहले से तय नहीं थी। 
 
यह बात है वर्ष 1992 की है, जब मेरी उम्र महज 18 वर्ष की थी। दिसंबर का महीना शाम के वक्त मैंने अपने परिजनों से कहा मुझे भी अय़ोध्या जाना है। बस देखकर आना है कि आखिर ऐसा क्या है कि जिसके कारण इतने साल लग गए। तीन भाइयों के परिवार में मैं सबसे छोटा था। मेरी जिद देख मेरे चाचा भी मेरे साथ चलने के लिए तैयार हो गए। मुझे परिजनों से अनुमति मिल ही गई। मैं अयोध्या जाने को लेकर काफी उत्सुक था। 
इतने बरस बीत जाने के कारण दिन तो ठीक से याद नहीं रहा। मैं और चाचा बिलासपुर से सारनाथ एक्सप्रेस में चढ़े। हमारे साथ 60-70 लोग और अय़ोध्या जा रहे था। उस वक्त मुझे इस बात का जरा भी अंदेशा नहीं था कि वहां जाकर विवादित ढांचा गिरने के साक्षी होंगे। खैर जो कुछ भी हो रहा था, वो सब राम जी की लीला थी। सारनाथ से हम रात को निकले और सुबह इलाहाबाद पहुंच गए। वहां पर हमें संघ कर्यालय ले जाया गया। जहां नाश्ता ,चाय- पानी, खाना सबकी सुविधा थी। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि हम घर से बाहर है। सब कुछ समय पर हो गया। फिर हमें बोला गया कि आप लोग अयोध्या मत जाइए, वहां पर पैर रखने की भी जगह नहीं है। आप सब यही से कारसेवा कर लीजिए और अपने घर वापस चले जाइये।। 
 
हम सबने सोचा इतनी दूर खाना खाने, मस्ती मारने तो आये नहीं है। हम सब तो अयोध्या जायेंगे, चाहे फिर दो घंटे के लिए क्यों न जाये। शाम को हम सब फिर रेलवे स्टेशन पहुंचे। सरयू एक्सप्रेस तो कारसवेकों से भरी पड़ी थी। मैंने चाचा से बोला हो कि हम जा पाएंगे तो उन्होंने बोला सब हो जाएगा। मन में थोड़ा डर था, लेकिन चाचा साथ थे, तो वो भी चला गया। दौड़ते- भागते रेल के सबसे आखिरी डिब्बे में हम दोनों जैसे- तैसे चढ़ गए। सिर्फ खड़े होने की जगह थी, ट्रेन में चढ़े सभी लोग कारसेवक थे। यही एक परिचय था। किसी ने किसी को परेशान नहीं किया। "जय श्री राम बोलते- बोलते हम करीब रात 12- 1 अयोध्या पहुंचे।
शायद मैंने जिंदगी में पहली बार इतनी सभ्य भीड़ देखी। जहां इतने सारे लोग लेकिन किसी प्रकार का कोई शोर- शराबा नहीं। सब एक नियम से चल रहे थे। हमारी व्यवस्था श्री कारसेवकपुरम में थी, बहुत बड़े मैदान में मध्यप्रदेश के लिए तम्बू में हम दोनों चाचा-भतीजा को जगह मिल गई। सोने और खाने के लिए तो हम आए नहीं थे, मैं तो सुबह 7 बजे उठकर अयोध्या भ्रमण के लिए निकल पड़ा। चाचा को बोला मैं यही तंम्बू में मिलूंगा, आप चिंता मत करना। अयोध्या भ्रमण के समय जब ढांचे को देखा तो पहली बार लगा बाबरी विवाद को राजनीतिक कारणों से कुछ ज्यादा बड़ा बना दिया है। जबकि ऐसा कुछ था ही नहीं। एक बहुत ही अव्यस्थित सा ढांचा था और वहां पर हमारे राम जी थे। थोड़ा दुख हुआ।
 
अयोध्या की गलियों में लोगों का हुजूम था। हर एक अयोध्यावासी सेवा करने के लिए तत्पर था। वहां हर कोई यही पूछ रहा था कि भैया खाना खा लिए न, अकेले ही आये हो या साथ मैं कोई और भी है। हम तो भैया घर से कारसेवा करने निकले थे, लेकिन मालूम नहीं था कि यह होती कैसी है। वहां के जो लोग कारसेवकों को खाना और अन्य चीजें पूछ रहे थे, उनके चेहरे पर एक अलग ही डर था। वहां के लोगों ने बताया कि पिछली कारसेवा का बहुत से कारसेवक तो जिंदा वापस ही नहीं आए। बहुत ने अपने घर की दीवारों पर लगी गोलियों के निशान दिखाए। तब पहली बार ऐसा लगा कि ये आखिर ऐसा बोल क्यों रहे हैं। 
 
मुझे घूमते-घूमते बहुत देर हो चुकी थी और लगा कि अब चाचा परेशान हो रहे होंगे, चलना चाहिए। मैं कैंप में लौट आया। फिर हम दोनों ने खाना खाया और दोपहर को दो बजे नेताओं का भाषण सुनने के लिए सभा स्थल पर पहुंचे। लालकृष्ण आडवाणी, विनय कटियार, उमा भारती और साध्वी ऋतुंभरा सबने बोला कि कल प्रतीकात्मक कार सेवा करनी है। सुबह नहाकर सरयू नदी से रेत लाये और विवादास्पद भूमि के बाहर रेत डाले और अपनी कार सेवा को पूर्ण करें। हम छत्तीसगढ़ के भोले-भाले लोगों ने सर हिलाकर उनकी बातों को गांठ बांधकर रख लिया। उसके बाद दिनभर अयोध्या भ्रमण लोगों से मिलना, मंदिर जाना चलता रहा। इतने सारे लोग, लेकिन किसी भी प्रकार का कोई विवाद, झगड़ा, मारपीट, दंगा कुछ भी नहीं। रात को सब रेडियो पर समाचार सुनते। समाचार में जिस प्रकार से न्यूज आती, उससे देशभर में कारसेवकों का दुष्प्रचार हो रहा था। हमारे बारे के गलत  खबरें चल रही थीं। तब मुझे लगा कि हम राजनीति में फंस गए है, लेकिन राम जी की नगरी अयोध्या में डर कैसा। हम दोनों वापस अपने तम्बू में आ गए। सुबह तीन बजे जो उठना था।
 
दूसरे दिन अलसुबह 3 बजे मैं और चाचा सरयू नदी की ओर रवाना हुए। ठंड ऐसी की सब कुछ जमा दें। जैसे-तैसे डुबकी  मारी, कारसेवा के लिए मुट्ठी भर रेत सरयू से निकाली। हनुमान जी के दर्शन किए और पहुंच गए कारसेवा के लिए। अब सुबह के करीब 7 बजे होंगे।। छत्तीसगढ़ प्रांत का नंबर सबसे आखिरी में था। कुछ तो सोच रहे थे, अपना नम्बर आएगा भी की नहीं।  सारे नेता एक ही बोल रहे थे, लाइन से आइये, अपनी रेत सही जगह डालिये और घर जाइये। कोई भी ढांचे के पास नहीं जाएगा उसको नुकसान नहीं होना चाहिए। 
 
अब लगभग दोपहर के 11 बज चुके थे, घर की बहुत याद भी आ रही थी। मन में लग रहा था कि अब घर जाना है जल्दी गाड़ी पकड़नी है।  देखते ही देखते खबर आई कुछ लोग ढांचे पर चढ़ गए है। हमने सोचा यह क्या हो गया। अब हमने अपने लिए एक सुरक्षित स्थान खोजा और भगदड़ से बचने के लिए पास के पहाड़ पर चढ़ गए। देखते ही देखते विवादित बाबरी ढांचे का पहला, फिर दूसरा और आखिर में तीसरा गुंबद ढह गया। 
सभी आयोजकों के होश उड़ गए थे, अब क्या करें। रामलला तो खुले आकाश में आ गए थे। सभी ने मोर्चा संभाला। जगह को समतल किया गया हमारी कारसेवा अब चालू हुई। हम सबने मिलकर भगवान के लिए एक टेंटनुमा मंदिर बनाया और उसमें भगवान को लाया गया। शाम सात बजे तंबू में वापस गए और हमें रात 12 बजे अयोध्या छोड़ने बोला गया। लगभग एक बजे स्पेशल ट्रेन से हम इलाहाबाद वापस आए। रास्ते में दंगों का डर, लेकिन प्रभु राम कृपा से हम सभी सकुशल इलाहबाद पहुंच गए। मुझे आने के बाद मालूम चला कि मेरे पिताजी इस कारण बहुत परेशान हो गए और उन्हें दिल का दौरा पड़ा। लेकिन प्रभु कृपा से उन्हें कुछ नहीं हुआ। हम इलाहाबाद से कटनी होते हुए बिलासपुर पहुंच गए।
(लेखक मदन दत्तात्रय होनप महाराष्ट्र मंडळ, रायपुर के आजीवन सभासद है।)