दिव्य महाराष्ट्र मंडल

भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के पराक्रम का महाराष्ट्र मंडल में स्मरण

रायपुर। महाराष्ट्र मंडल में शनिवार शाम को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के बलिदान के स्मरण में शहीद दिवस मनाया गया। तीनों वीर  बलिदानियों की तस्वीर पर मंडल अध्यक्ष अजय काले, सचिव चेतन दंडवते और वरिष्ठ आजीवन सभासद दीपक पात्रीकर ने गुलाल का टीका लगाकर माल्यार्पण किया। 
 
सादगीपूर्ण संक्षिप्त कार्यक्रम को संबोधित करते हुए दीपक पात्रीकर ने कहा कि भगत सिंह, श्रीराम हरि राजगुरु और सुखदेव थापर ने भारत देश की आजादी के लिए चलाए जा रहे आंदोलन को अपनी शहादत से जो गति प्रदान की, वह 15 अगस्त 1947 को भारत देश की आजादी के बाद ही थमी। इन तीनों बलिदानियों ने पब्लिक सेफ्टी और ट्रेड डिस्ट्रीब्यूट बिल्स के विरोध में सेंट्रल असेंबली में आठ अप्रैल 1929 को बम फेंका था। बम फेंकने के बाद इन युवाओं के पास भागने का समय था, लेकिन उन्होंने न केवल सहर्ष गिरफ्तारी दी, बल्कि भारत देश की आजादी के नारों के साथ 23 मार्च 1931 को फांसी पर झूल गए। 
 
अध्यक्ष अजय मधुकर काले ने कहा कि पराधीन भारत में भगत सिंह एक बात हमेशा कहा करते थे कि जिंदगी अपने कंधों पर जी जाती है, दूसरों के कंधों पर तो जनाजे जाते हैं। वे मानते थे कि देश को आजाद करना है तो हमें अपने संघर्षों से ही करना है। किसी दूसरे से ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती.
सचिव चेतन दंडवते ने कहा कि जो लोग अपने अधिकार की बात करते हैं, हर सुविधा पर अपना हक जताते हैं, उन्हें इन पराक्रमियों का जीवन चरित्र पढ़ना चाहिए। सोचिये, अगर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने अपने अधिकारों की बात की होती, अपने सुविधाओं के लिए लड़ाई की होती और इस देश ने मुझे क्या दिया जैसे विचार के साथ घूम- घूमकर अपनी भड़ास निकाली होती, तो आज हम कहां होते और हमारा देश कहां होता। जिस दिन हम यह सोचने लगे कि मैंने अपने देश के लिए क्या किया। उस दिन से भारत खुशहाली, सौहार्दशाली व तीव्र गति से प्रगति करने वाले राष्ट्र बनने की दिशा में सरपट दौड़ने लगेगा।
इस अवसर पर वरिष्ठ सभासद अतुल गद्रे, कला संस्कृति समिति के रंजन मोडक, सांस्कृतिक समिति के प्रमुख प्रेम उपवंशी समेत अनेक युवाओं ने अपनी उपस्थिति दी। राष्ट्रगान के बाद कार्यक्रम समाप्त हुआ।